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भूमिका

राष्ट्रीय अभियान समिति (एन0सी0सी0) की बैठक 22-23 नवम्बर 2012 को हुई थी। इसमें ताजा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक हालात का जायजा लेते हुए राजनीतिक परिस्थितियों की समीक्षा की गयी। समिति में यह सहमति बनी कि राजनीतिक चुनौती का मुकाबला राजनीतिक ढंग से किया जाना चाहिए और इस उद्देश्य के लिए एक भिन्न राजनीतिक संगठन की स्थापना होनी चाहिए। बैठक में निम्नलिखित फैसला लिया गया:

''एन0सी0सी0 अपने मौजूदा स्वरूप में बनी रहेगी और अपने सभी सदस्यों के साथ काम करती रहेगी। एनसीसी से इतर एक नयी राजनीतिक संरचना स्वरूप ग्रहण करेगी। यह उन तमाम इकाइयों/संरचनाओं को एक साझी पहचान और राजनीतिक जमीन देगी जो अलग-अलग राजनीतिक संरचना के रूप में काम कर रहे हैं जैसे कि जन संघर्ष मोर्चा, क्रांतिकारी समता पार्टी, जन संग्राम परिषद जो एनसीसी से जुड़े हंै और इसके घटक हैं। एनसीसी के सदस्यों को नए राजनीतिक संगठन में शामिल होने के बारे में स्वयं फैसला करना होगा।''

इस फैसले के बाद ''आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (रेडिकल): आइपीएफ (आर)'' नाम से राजनीतिक संगठन को चुनाव आयोग में पंजीकृत कराने और इसका संविधान बनाने के लिए कदम उठाए गए। अब यह चुनाव आयोग में पंजीकृत संगठन है।

बाद में 30 सितम्बर 2013 को सम्पन्न बैठक में मसौदा संविधान पर विचार हुआ। यह सर्वसम्मत से फैसला हुआ कि संविधान में सांगठनिक ढांचे, शक्तियों तथा कार्यप्रणाली के अतिरिक्त एक संक्षिप्त प्रस्तावना तथा चुनाव आयोग द्वारा वांछित उद्घोषणा होनी चाहिए। यह भी तय किया गया कि एक अलग 'नीति लक्ष्य' का अनुच्छेद होना चाहिए जो संविधान का अभिन्न अंग होगा। मसौदे को विचार-विमर्श तथा सदस्यों एवं शुभचिंतकों के प्राप्त सुझावों के आधार पर तथा सभी सम्बंधित लोगों की सहमति से अंतिम रूप देते हुए बैठक में मौजूद आइपीएफ (आर) प्रतिनिधियों द्वारा स्वीकृत किया गया। आइपीएफ (आर) के ''संविधान तथा नीति लक्ष्य'' को प्रस्तुत किया जा रहा है।

दिनांकः: 21. 11.2013
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
राष्ट्रीय संयोजक : आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (रेडिकल)
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (रेडिकल) के गठन की पृष्ठभूमि

जन संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में 23.08.2010 को नई दिल्ली मेें देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति पर विचार-विमर्श के लिए एक बैैठक आयोजित की गयी। जन संघर्ष मोर्चा के आयोजकों के अतिरिक्त बैैैैैैैैैठक में समान विचारधारा वाले अन्य राजनैतिक संगठनों में राजकीय जनांदोलन,कर्नाटक, भाकपा(माले) मास लिबरेशन,तमिलनाडु, क्रांतिकारी समता पार्टी, बिहार, झारखंड पीपुल्स फ्रंट, दलित एवं समाजवादी आंदोलन से जुड़े नेता और स्वतंत्र कार्यकर्ता, बुद्धिजीवियों एवं अकादमिक जगत से जुड़ी हस्तियों ने शिरकत की। शासक वर्गों द्वारा सारी राजनीतिक जमीन को वस्तुतः हड़प लेने के परिणामस्वरूप पैदा हुआ राजनीतिक ठहराव, बैठक के विचार-विमर्श का आधार रहा। बैठक में जिन प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा की गयी, वे हैं - अभूतपूर्व मूल्यवृद्धि के फलस्वरूप गरीब और निम्न मध्यवर्ग की तबाही; भूमि अधिग्रहण एवं बाजार प्रक्रिया के जरिए भारी पैमाने पर भूमि हड़प; समाज के हाशिये पर पड़े लोगों की आजीविका पर बढ़ता खतरा; शासक वर्गों में बढ़ती फासीवादी प्रवृत्तियां; अल्पसंख्यक, दलित व आदिवासी और अतिपिछड़ों के समक्ष मौजूद गंभीर चुनौतियां; कश्मीर घाटी के गंभीर हालात; सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष को तत्काल आगे बढ़ाने की जरूरत और सर्वोपरि राज्य संस्थाओं की ओर से गंभीर चुनौती का सामना कर रही लोकतांत्रिक स्वतंत्रता एवं अधिकारों की रक्षा व उन्हें बचाने का कार्यभार। लुटेरी पूंजी एवं इसकी संस्थाओं द्वारा जारी हमले के विरुद्ध जनता का प्रतिरोध व संघर्ष तेज हो रहा है और इस प्रकार बदलाव की राजनीति की जमीन का निर्माण व विस्तार कर रहा है।

आज वक्त की मांग है कि एक ऐसी व्यापक आधार वाली राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू किया जाय जो एक समावेशी और रेडिकल मंच में विभिन्न राजनीतिक प्रवृत्तियों और आंदोलनों को ले आए और जनसंघर्षों को मजबूत करे। यह बैठक जिसमें समान विचारधारा वाले दलों, आंदोलनों, समूहों और व्यक्तियों ने शिरकत की, उसी दिशा में एक विनम्र लेकिन उत्साहवर्द्धक शुरुआत है।

बैैैैैैैैठक में श्री एस पी शुक्ला द्वारा प्रस्तुत पर्चे जिसका शीर्षक था ‘‘एक रेडिकल एवं समावेषी राजनैतिक मंच का प्रारूप’’ पर चर्चा हुयी। बैठक ने पर्चे का अनुमोदन किया। बैठक में कई प्रस्ताव व निर्णय लिए गए। पुस्तिका का पहला भाग पर्चे को प्रस्तुत करता है, प्रस्ताव व निर्णय दूसरे भाग में हैं। अब इस कार्यभार को आगे बढ़ाने की बात है। विचार-विमर्श के बाद बनी राष्ट्रीय अभियान समिति आने वाले दिनों में इस कार्यभार को पूरा करेगी।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ्र
बैठक में लिए गए फैसले व प्रस्ताव

1. भूमि अधिग्रहण व भूमि हस्तांतरण और विस्थापन

बैठक ने महसूस किया कि राज्यों द्वारा लागू किए जा रहा भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 और इस तरह के अन्य कानून बुनियादी तौर पर त्रुटिपूर्ण हैं - क्योंकि वे ‘‘सर्वोपरि अधिकार’’ के सिद्धांत ;कवबजतपदम व िश्मउपदमदज कवउंपदश् द्ध पर आधारित हैं; वे सार्वजनिक हित को ढील-ढाले ढंग से परिभाषित करते हैं, जिससे सरकार की निजी कंपनियों व उद्योगों के मददगार और एजेंट वाली सवालिया भूमिका को वैधता मिल जाती है; वे आदिवासियों एवं वन निवासियों को भूमि और आवास के संदर्भ में उपलब्ध संवैधानिक एवं कानूनी सुरक्षा की अवहेलना करते हैं; वे किसी भी तरह के अधिग्रहण व हस्तांतरण के लिए ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य शर्त बनाने में विफल साबित हुए हैं; वे इस उसूल को मान्यता देने में विफल रहे हैं, उन सभी के लिए जिनकी आजीविका किसी भी तरह के अधिग्रहण व हस्तांतरण से खतरे में पड़ी है, जिसमें समुचित, वैकल्पिक आजीविका का प्रावधान किसी भी अधिग्रहण व हस्तांतरण के लिए अनिवार्य पूर्वशर्त होना चाहिए।

बैठक ने रेखांकित किया कि इस कानून के प्रस्तावित संशोधन इन बुनियादी खामियों को दूर कर पाने में सक्षम नहीं हैं।

बैठक ने प्रस्ताव लिया कि

- कि कुख्यात सेज कानून समेत ऐसे सभी कानूनों को वापस लिया जाय;

- कि कृषि, वन एवं खनन भूमि को कारपोरेट क्षेत्र को हस्तांतरण पर तत्काल रोक लगायी जाय;

- कि कृषियोग्य भूमि के आमतौर पर गैरकाश्तकारों और खासतौर पर विदेशियों एवं अनिवासी भारतीयों को किसी भी हस्तांतरण को तत्काल प्रतिबंधित किया जाय;

- आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासी को किसी भी तरह के हस्तांतरण को अविलंब निषिद्ध किया जाय;

- जब तक एक नई रेडिकल नीति, जो अपने अंतिम लक्ष्य में भूमि को माल के रूप में देखने की विरोधी हो, सूत्रबद्ध नहीं हो जाती, तब तक विशिष्ट सामाजिक कल्याण के उद्देश्य के लिए संबंधित ग्रामसभा की सहमति तथा ऐसे अधिग्रहण व हस्तांतरण से जो लोग विस्थापित होते हैं और/अथवा जिनकी आजीविका प्रभावित होती है, उन सबके लिए समुचित वैकल्पिक आजीविका के पूर्व-प्रावधान के साथ केवल परस्पर सहमति पर आधारित अधिग्रहण व हस्तांतरण की इजाजत दी जाय;

बैठक में आगे प्रस्ताव लिया गया

- कि एक सर्वांगीण, जनपक्षीय, पर्यावरण के अनुकूल, क्षेत्रीय विशिष्टताओं के अनुरूप और वैज्ञानिक ढंग से जमीन के उपयोग की नीति, जो खाद्य सुरक्षा, जैविक विविधता और जमीन पर निर्भर सभी लोगों की बेहतरी और एकजुटता को बढ़ावा देने वाली हो, को सूत्रबद्ध करने के लिए राष्ट्रीय भूूमि उपयोग आयोग का गठन किया जाय।

2. खनिज एवं खनन

बैठक ने महसूस किया

कि जहां हर तरह का खनन जोखिमपूर्ण, पर्यावरणनाशक, जैवविविधता के लिए हानिकारक, भूमि एवं जल संसाधनों के लिए विनाशकारी है और सदा-सदा के लिए उन्हें अनुपयोगी बना देता है और भारी पैमाने पर विस्थापन करने वाला एवं आजीविका को छीनने वाला है, वहीं एक शहरी-औैैैैैैैैैैैद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए कुछ खनन अपरिहार्य है; क्यांेकि खनिज संपदा जनता और भावी पीढ़ियों से संबंधित है, अतः खनिज संसाधनों का स्वामित्व जनता के हाथ में होना चाहिए और इन संसाधनों का पूर्ण सामाजिक नियंत्रण में दोहन किया जाना चाहिए; कि खनन गतिविधियों को पर्यावरणीय एवं सामाजिक स्वीकार्यता के आधार पर करने की जरूरत है और उस क्षेत्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में इसका योगदान भी होना चाहिए; कि 1993 से खनन एवं खनिज नीति में तेज उदारीकरण, खनन क्षेत्र को देशी व विदेशी बड़ी पूंजी के लिए खोल देने के फलस्वरूप एक ओर भारी मुनाफाखोरी एवं चैतरफा व्याप्त भ्रष्ट्राचार की वजह से राष्ट्रीय खनिज संपदा की बेलगाम लूट, वहीं दूसरी ओर गरीब जनता विशेषकर खनिज संपदा संपन्न जमीन एवं वन पर आधारित आदिवासियों के आवास व आजीविका का निर्मम विनाश- इस सबका कुल परिणाम आदिवासियों एवं वन निवासियों में अभूतपूर्व विक्षोभ एवं अलगाव के रूप में प्रकट हुआ है। कि हालात की मांग है कि नीतियों, कानूनों, नियामक संस्थाओं और इन्हें क्रियान्वित करने वाली मशीनरी में तात्कालिक एवं आमूल बदलाव किया जाय, जो इस मान्यता पर आधारित हों कि इन नीतियों एवं कानूनों में सामुदायिक सहमति एवं कल्याण निहित होने चाहिए।

बैठक ने आगे रेखांकित किया

कि प्रस्तावित खनन एवं खनिज विकास कानून यानी खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) विधेयक, 2010 का प्रारूप आवष्यक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है, खासकर यह अभी भी सबको एक तराजू में तौलने का फलसफा गढ़ता है और देशी व विदेशी बड़ी पूंजी के लिए नीतिगत तौर पर आकर्षक एवं अनुकूल माहौल बनाने की बात करता है।

बैठक ने प्रस्ताव लिया

- कि जब तक एक सुसंगत, दूरगामी, जनपक्षधर, पर्यावरण संरक्षक तथा आमतौर पर सामाजिक रूप से स्वीकार्य और खासकर आदिवासी समर्थक नीति सूत्रबद्ध नहीं हो जाती तब तक -

- आदिवासी इलाकों में सहमति पत्रों (लेटर आफ इन्टेंट्स) को जारी करने, लाइसेंस, अनुमति या खनन के ठेके देने और वन संसाधनों के दोहन पर तत्काल रोक लगायी जाय और उन सभी दी गयी अनुमतियों/ठेकों जो कि 1993 में नई राष्ट्रीय खनन नीति के लागू होने के बाद से पिछले 16 सालों सें जारी हैं, की समीक्षा की जाय, नई खनन नीति में 13 प्रमुख खनिजों के खनन की अनुमति दी गयी है, जो इस प्रकार हैं- लौह अयस्क, मैग्नीज अयस्क, क्रोम अयस्क, सल्फर, सोना, हीरा, तांबा, सीसा, जस्ता, मोलीब्डेनम, टंग्स्टेन, निकिल और प्लैटिनम;

- खनिजों के सभी निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाय;

- समाज के उन हिस्सों की पूर्ण भागीदारी और सहमति के साथ, जो खनिज संसाधनों के दोहन से सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, खनिज संपदा और खनन को पूर्ण जन स्वामित्व एवं सामाजिक नियंत्रण में बहाल किया जाना चाहिए।

3. कीमतें, रोजगार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस)

बैठक ने नोट किया

कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति एक महामारी की तरह हाल के वर्षों में विकराल रूप धारण करती जा रही है। निर्वाह इंडेक्स की कीमतें (औद्योगिक मजदूरों की) 2008-09 के दौरान 8 प्रतिशत और 2009-10 में 15 प्रतिशत तक बढ़ गयी हैं और खाद्य पदार्थों की कीमतें अक्टूबर 2009 में 15 प्रतिशत, नवंबर 2009 में 18 प्रतिशत और दिसंबर 2009 में बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गयी हैं। इस खतरनाक स्थिति के बावजूद, सरकार ने पेट्रोल, डीजल, किरोसिन, घरेलू गैस के दाम बढ़ा दिए एवं पेट्रोल की कीमतों पर नियंत्रण खत्म कर दिया। जिसका परिणाम चैतरफा यातायात एवं ईंधन की कीमतों में वृद्धि के रूप में हुआ और इसने कीमतों की उछाल में आग में घी डालने का काम किया। बैठक ने खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेज उछाल पर गहरी चिंता जाहिर की। जुलाई 2008 से जुलाई 2010 के दौरान गेहूं और चावल के दाम में 19 प्रतिशत, तुअर दाल में 58 प्रतिशत, मूंग दाल में 113 प्रतिशत, चीनी 73 प्रतिशत आलू प्याज में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुयी, सब्जी, मछली, मांस और दूध के दाम भी चढ़ रहे हैं। गेहूं और चावल के मामले में यद्यपि सरकार के पास भारी स्टाक मौजूद था, जिस पर भारी खर्च आ रहा था और जिसकी बर्बादी हो रहा थी, लेकिन इस स्टाक को जरूरतमंदों को उपलब्ध नहीं कराया गया, वे गरीबी रेखा के ऊपर (एपीएल) के रूप में अयोग्य माने गए। सार्वभौमिक पीडीएस के स्थान पर 1997 में लाए गए लक्षित पीडीएस ने पीडीएस के मूल उद्देश्य को ही नष्ट कर दिया, जो कि कीमतों को स्थिर रखता था और सभी को वाजिब दामों पर अनाज एवं चीनी की गारंटी करता था। गहराता कृषि संकट की जो कि कई कारकों का सम्मिलित नतीजा है, खाद्य पदार्थों की कीमतों को बढ़ाने में काफी भूमिका है। बैठक ने आगे रेखांकित किया कि जबकि खाद्य पदार्थो के दाम चढ़ रहे है, किसानों को अपने उत्पाद का समुचित लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग इसकी गारंटी करने में विफल रहा है। आयोग को वैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं हैं, इसकी कार्यप्रणाली पारदर्शी एवं वैज्ञानिक नहीं है, इसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं है और सरकार द्वारा समर्थन मूल्य की धोषणा बुआई के मौसम के काफी बाद की जाती हैं।

बैठक ने प्रस्ताव लिया

- कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे का विस्तार किया जाय, इसके दंडात्मक प्रावधानों को मजबूत किया जाय और इसके कड़ाई से लागू करने की गारंटी की जाय।

- कि सभी पेट्रोलियम उत्पादों पर प्रशासनिक मूल्य प्रणाली को बहाल किया जाय; तेल पूल खाते को पुनः खोला जाय और उचित कर ढांचे एवं क्रास-सब्सिडीकरण के माध्यम से विभिन्न वर्गों के उपभोक्ताओं की भुगतान क्षमता के अनुरूप पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को निर्धारित किया जाय।

- कि नरेगा का सार्वभौमीकरण किया जाय; साल में काम के दिनों को बढ़ाकर 300 दिन किया जाय; और जो लोग योजना में काम की मांग करते हैं, उनके वाजिब मजदूरी की गारंटी की जाय;

- कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सार्वभौमीकरण किया जाय; स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने वाले ज्वार, बाजरा जैसे अनाज और अन्य आवश्यक सामग्रियों जैसे खाद्य तेल, दाल और किरोसिन को इसमें शामिल करते हुए इसके दायरे को बढ़ाया जाय।

- कृषि लागत एवं मूल्य आयोग को वैधानिक दर्जा दिया जाए; इसकी कार्यप्रणाली को पारदर्शी एवं वैज्ञानिक बनाया जाए; इसकी सिफारिशों को बाध्यकारी बनाया जाए और समर्थन मूल्य की धोषणा बुआई के बहुत पहले ही हो जानी चाहिए।

4.कश्मीर

बैठक ने इस बात पर गहरी चिंता जाहिर की कि प्रधानमंत्री द्वारा उचित समय पर और सहानुभूतिपूर्ण रुख न अख्तियार करने के कारण कश्मीर घाटी के त्रासद हालात और खराब हो गए। भारत सरकार अलगाव की जमीनी सच्चाई को समझने के बजाय बाहरी ताकतों पर ही सारा दोषारोपण करने में व्यस्त रही। बैठक ने सुरक्षा बलों द्वारा निहत्थे प्रदर्शनकारियों की हत्या की कड़ी निंदा की। इस तरह की कार्रवाई ने जनता के अलगाव को बढ़ाने का काम किया और इसने नेशनल कांफ्रेस-कांग्रेस सरकार द्वारा जनता की दुर्दशा के प्रति बरती जा रही उपेक्षा और उदासीनता का पर्दाफाश भी कर दिया।

इस बैठक ने राज्य एवं यूपीए सरकार से मांग की कि वह हिंसा को रोके और एक खास समयसीमा के अंदर संवाद की प्रक्रिया को शुरू करे। सरकार द्वारा विश्वास बहाली के लिए:-

- सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार विधेयक ;।थ्ैच्।द्ध को हटाया जाय;

- केन्द्रीय सुरक्षा बलों के स्थान पर राज्य पुलिस की तैनाती की जाय;

- गिरफ्तार नौजवानों को रिहा किया जाय;

- राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाय;

- राजनैतिक समाधान की खातिर जम्मू कश्मीर के सभी तबकों से अविलंब बातचीत शुरू की जाय;

- फर्जी मुठभेड़ों के दोषियों को दंडित किया जाय;

- विक्षोभ और अपमान का कारण बने बस्तियों में स्थापित बंकरों को हटाया जाय;

- घाटी की जनता के लोकतांत्रिक अधिकार एवं आजादी को बहाल किया जाय;

- नागरिक समाज के माध्यम से सांप्रदायिकता के विरुद्ध जनगोलबंदी की जाय;

5. लोकतांत्रिक अधिकार

बैठक ने लोकतांत्रिक अधिकारों एवं आजादी में अभूतपूर्व क्षरण पर गहरी चिंता जाहिर की। पिछले कुछ वर्ष मूलभूत लोकतांत्रिक आजादी को सीमित करने हेतु नए-नए कानून ईजाद करने के साक्षी रहे हैं। सभी राज्यों में इन कानूनों के दुरुपयोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं। सर्वोपरि, हम ”आतंकवादी खतरे“ अथवा ”आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरों“ का मुकाबला करने के नाम पर भारी पैमाने पर ‘‘एनकांउटर हत्याओं’’ के गवाह बन रहे हैं। हम राज्य एवं केंद्रीय सुरक्षा बलों को विभिन्न नामों से युद्ध जैसे अभियान संचालित करते भी देख रहे हैं, ‘‘आपरेशन ग्रीन हंट’’ इसका सबसे ताजा नमूना है। बैठक ने आगे इस बात को महसूस किया कि नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन के अपने अनिवार्य परिणाम हैं। यह बढ़ती हुयी गैरबराबरी और ध्रुवीकरण को जन्म दे रहा है। इसका परिणाम है लुटेरा पंूजी संचय। यह आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में व्यापक जनसमुदाय को अलगाव और हाषिये पर ढकेल रहा है। यह शासक वर्गों को इन नीतियों के क्रियान्वयन से पैदा होने वाले आक्रोश को संभालने के लिए अधिकाधिक बल प्रयोग को बाध्य कर रहा है। राज्य तथा राजनैतिक तंत्र की तमाम संस्थाएं, जिन्हें लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का रक्षक एवं जनपक्षीय नीतियों के क्रियान्वयन में सहयोगी माना जाता था, के भी अधिकाधिक हिस्से नव-उदारवाद के अनिवार्य तर्क के प्रभाव में आते जा रहे हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाने तथा जनवादी अधिकारों पर हमलों को वैध ठहराने हेतु नव-उदारवादी नीतियों का तर्क उग्र क्षेत्रीय, अंधराष्ट्रवादी संकीर्ण झगड़ों को शह देता है। इस पृष्ठभूमि में बैठक ने मांग की कि ऐसे सभी काले कानूनों का खात्मा किया जाय जो हाल के वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा एवं सार्वजनिक व्यवस्था की बहाली के बहाने बनाए गए हैं, लेकिन इन तमाम कानूनों की सच्चाई यह है कि इनका इस्तेमाल बड़ी पूंजी के हितों का संवर्धन करने वाली नव-उदारवादी नीतियों के जरिए किए जा रहे शोषण एवं जुल्म के खिलाफ जनता के उभार एवं जनसंघर्षों को कुचलने के लिए किया जाता है। बैठक ने मांग की कि ‘‘आपरेशन ग्रीन हंट’’ को तत्काल समाप्त किया जाय; बैठक ने मांग की कि सषस्त्र बलों को विशेष अधिकार विधेयक ;।थ्ैच्।द्ध को भी वापस लिया जाय।

6. अल्पसंख्यकों, आदिवासियों-वनवासियों और अतिपिछड़ों को सामाजिक न्याय (जन संघर्ष मोर्चा द्वारा प्रस्तुत)

बैठक ने इस बात को रेखांकित किया कि सामाजिक न्याय की यात्रा अभी भी अधूरी है- अल्पसंख्यक, अति पिछड़े, आदिवासी और महिलाओं को जब तक उनके अधिकार नहीं प्राप्त हो जाते तब तक सामाजिक न्याय का एजेंडा पूरा नहीं माना जा सकता। बैठक ने सरकार से मांग की कि वह रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पोट तत्काल लागू करे, इसकी संस्तुति के अनुरूप पिछड़े मुसलमानों को अलग आरक्षण कोटा दिया जाय और दलित अल्पसंख्यकों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जाय। बैठक ने महसूस किया कि अतिपिछड़े समुदाय को मण्डल कमीशन की रिर्पोट को लागू होने के बीस वर्ष बाद भी सामाजिक न्याय हासिल नहीं हो सका है। आज भी अतिपिछड़े समुदाय की शासन व प्रशासन में हिस्सेदारी बेहद कम है। मण्डल कमीशन के सदस्य एल.आर. नायक को भी यह भय था कि अतिपिछड़ों का कोटा अन्य पिछड़ा वर्ग में से अलग नहीं किया गया तो उन्हें सामाजिक न्याय नहीं मिलेगा। गौरतलब है कि उन्हांेने इसी वजह से कमीशन से इस्तीफा भी दे दिया था, उनकी आशंका सच साबित हुई। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने निर्णय में कहा है कि सरकार चाहे तो अतिपिछड़ों के सामाजिक न्याय के लिए उनका कोटा अलग कर सकती है। बैठक ने सरकार से मांग की कि अतिपिछड़ों के सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए तत्काल राष्ट्रीय आयोग का गठन करे ताकि एक तय समय सीमा में अतिपिछड़ों को सामाजिक न्याय प्रदत्त कराया जा सके और उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में से अलग आरक्षण कोटा दिया जाए। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो आदिवासी समाज के साथ बड़ा अन्याय हुआ है। कोल, मुसहर (वनवासी), धांगर (उरांव), धरिकार, कोरंवा जैसी आदिवासी जातियों को आदिवासी का दर्जा ही नही दिया गया। परिणामतः जंगल पर निर्भर रहने वाली इन जातियों को लम्बे संघर्षो के बाद जंगल की जमीन पर पुश्तैनी अधिकार की बहाली के लिए बने वनाधिकार कानून का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। गोड़, खरवार, चेरो, पनिका, बैगा, भुईयां, अगरिया जैसी सोलह आदिवासी जातियां, जिन्हें 2003 में आदिवासी का दर्जा मिला, उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की ही हत्या कर दी गई। वह 2028 तक अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव ही नहीं लड़ पायेंगी। ज्ञातव्य हो कि 2003 के पूर्व यह जातियां अनुसूचित जाति में थी और इसी आधार पर यह सीटें अनुसूचित जाति क्षेत्र के बतौर आरक्षित की गईं। बैठक ने सरकार से मांग की कि कोल, मुसहर (वनवासी), धांगर (उरांव), धरिकार, कोरंवा जैसी आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए और गोड़, खरवार, चेरो, पनिका, बैगा, भुईयां, अगरिया जैसी आदिवासी जातियों के लिए रैपिड सर्वे कराकर पंचायत से लेकर विधानसभा-लोकसभा की सीटें आरक्षित की जाएं। बैठक ने केन्द्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण बिल को पुनः ठण्डे बस्ते के हवाले करने कीे कड़ी निंदा की और सरकार से लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए बने बिल को लोकसभा से तत्काल पारित करने और नौकरियों में भी महिलाओं को आरक्षण देने की मांग की।

7. रेड्डी बंधुओं की अगुआई में खनन माफिया द्वारा आंध्र प्रदेष-कर्नाटक की अंतर्राज्यीय सीमा के दोनों तरफ बेल्लारी आरक्षित वन क्षेत्र समेत बेल्लारी एवं कर्नाटक के अन्य जिलों में भारी पैमाने पर किए जा रहे अवैध खनन के संदर्भ में (एस आर हिरेमथ, राजकीय जनांदोलन कर्नाटक द्वारा प्रस्तुत) बैठक ने बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के नेतृत्व में खनन माफिया द्वारा खनिज सम्पदा (लौह अयस्क, मैग्नीज) की अभूतपूर्व लूट पर गहरी चिंता का इजहार किया और मांग की:

1. भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में पर्यावरणीय अनुमति के लिए लंबित पड़े प्रार्थनापत्रों को रद्द करने समेत कर्नाटक और उससे सटे आंध्र प्रदेश के क्षेत्र में नए खनन पट्टे जारी करने पर तत्काल रोक लगायी जाए;

2. लौह अयस्क, मैग्नीज एवं अन्य प्रमुख खनिजों का राष्ट्रीयकरण किया जाए, 15.03.2003 की तारीख में जारी अधिसूचनाओं (सीआई 33 एवं सीआई 16) और ऐसी ही परवर्ती अधिसूचनाओं को जो निजी पार्टियों के लिए वन एवं अन्य भूमि को (1300$वर्गमीटर) खनन के लिए खोलने की बात कहती हैं, को रद्द किया जाय।

3. कानूनों पर सख्ती से अमल करते हुए अवैध खनन खासकर वन एवं अन्य सामूहिक जमीनों पर, के खिलाफ प्रभावी कदम उठाए जाएं और पहले से ही प्रतिकूल असर से जूझ रहे जल संसाधनों की बहाली तथा उनका बचाव किया जाए और बढ़ते ठेकों (जो कि अवैध हैं) पर तत्काल रोक लगायी जाय।

4. रेड्डी बंधुओं तथा अन्य दूसरी राजनैतिक पार्टियों से जुड़े लोगों के साथ अवैध खनन में लिप्त लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाय।

5. प्रमुख खनिजों (जैसे कि लौह अयस्क) के निर्यात पर रोक लगायी जाय और मूल्य अभिवृद्धि के द्वारा इसका विवेकपूर्ण घरेलू उपयोग किया जाय तथा इसे भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखा जाय।

6. रेड्डी बंधुओं एवं अन्य लोगों द्वारा लूटी गयी सम्पदा को हासिल करने के लिए सख्त कदम उठाये जाएं और जहां जरूरी हो वहां उन पर आपराधिक कार्रवाई की जाय।

8. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण, मजदूरों की छंटनी और संगठित व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा ( खदान मजदूर यूनियन, इलाहाबाद द्वारा प्रस्तुत) बैठक ने प्रस्ताव लिया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण, विनिवेशीकरण और डाउनसाइजिंग, छंटनी की नीतियों के खिलाफ संघर्ष किया जायेगा और तय किया कि खेत मजदूरों समेत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए केन्द्रीय कानून के निर्माण के लिए संघर्ष किया जायेगा। बैठक ने शिक्षा मित्रों, किसान मित्रों, पंचायत मित्रों, आशा बहू, आंगनबाडी कार्यकत्रियों व सहायिकाओं को नियमित करने की मांग रखी। पत्थर खान व खदानों में लाखों पत्थर तोड़ने वाले श्रमिकों को श्रम व रोजगार मंत्रालय द्वारा बनी कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों से वंचित कर दिया गया है। बैठक ने मांग की कि उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिया जाय। इसी तरह बुनकरों की जीवन सुरक्षा के लिए विशेष पैकेज दिया जाए, उन्हें अन्य वित्तीय सहायता मुहैया करायी जाय और उनके सभी कर्ज माफ किए जाएं। बैैठक ने प्रस्ताव लिया कि रेडिकल एवं समावेशी मंच के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान को संचालित किया जाएगा। इस अभियान को संचालित करने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान समिति का गठन किया गया। अभियान समिति को इस अर्थ में खुला रखा गया कि अभियान के गति पकड़ने की स्थिति में यदि आवश्यक हुआ तों इसमें अन्य लोगों को भी सम्मिलित किया जा सकता है।

श्री एस पी शुक्ला: अध्यक्ष
श्री अखिलेन्द्र प्रताप सिंह: राष्ट्रीय संयोजक
23 अगस्त 2010 को सम्पन्न हुई बैठक ने ‘रेडिकल और समावेशी राजनैतिक मंच का प्रारूप‘ को रेखांकित करते हुए श्री एस0 पी0 शुक्ला द्वारा रखे पेपर को भी पारित किया गया ‘रेडिकल और समावेषी राजनैतिक मंच का प्रारूप‘

1. पिछले दो दशक में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों में उभार के फलस्वरूप आमतौर पर मेहनतकश जनता तथा विशेषकर छोटे व सीमान्त किसान और आदिवासी गहरे संकट के दौर से गुजर रहे हैं। हमारी जनता की विराट बहुसंख्या के लिए हमेशा से मुख्य चिन्ता के विषय रहे, जमीन, आजीविका और आवास के बुनियादी मुद्दों ने, आज नाजुक महत्व ग्रहण कर लिया है, जिसकी वजह से सर्वाधिक सीमांत तबकों का अस्तित्व ही दांव पर लग गया है। इस स्थिति में लोकतांत्रिक व्यवस्था की राजनीति की धुरी इन्हीं मुद्दों को होना चाहिए। विचित्र बात यह है सत्तारूढ़ पार्टी और प्रमुख विपक्षी दल इस मोर्चे पर एक अंधे मोड़ पर पहुंच गए लगते हैं। ऐसा नहीं है कि वे जनता के बुनियादी सवालों पर बात नहीं करते या उनके पास अ़ामतौर पर ‘‘विकास’’ और खासतौर पर ‘‘गरीबी उन्मूलन’’ की तमाम योजनाएं और कार्यक्रम नहीं हैं। लेकिन ‘‘विकास’’ का अर्थ किसी तरह जीडीपी की उच्च विकासदर हासिल करने तक सिमटकर रह गया है और ‘‘गरीबी उन्मूलन’’ के नाम पर कुछ जन-कल्याणकारी उपाय। एक बड़ा अंतर्विरोध हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है: विकास के नाम पर लागू की जा रही नीतियां इस गति से और इतने बड़े पैमाने पर असमानता, दरिद्रता और अभाव को जन्म दे रही हैं कि ‘‘गरीबी उन्मूलन’’ का दिखावा हमेशा अपर्याप्त और प्रतीकात्मक ही बना रहेगा।

2. जमीन, जल, जंगल, बीज और खनिज प्रत्येक के सभी जरूरी क्षेत्रों में नव-उदारवादी नीतियों ने एक ओर मेहनतकश जनता की विराट आबादी की बेहतरी, यहां तक कि उनके अस्तित्व तथा दूसरी ओर बड़ी पूंजी द्वारा आबाध मुनाफाखोरी के बीच अंतर्विरोध को तेज किया है। जीवन की इन बुनियादी जरूरतों को इस तरह माल में तब्दील किया जा रहा है, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। जनता तथा पर्यावरण दोनों के लिए इसके व्यापक अनगिनित दुष्प्रभावों की परवाह किए बगैर इन सारी चीजों को पूंजी संचय के लिए चारे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। समूचा किसान समुदाय कृषिशोध व प्रसार के क्षेत्र में कार्पोरेट क्षेत्र के प्रवेश, सिंचाई में निजी साधनों की बढ़ती भूमिका तथा लागत सामग्री पर सब्सिडी के खात्मे की वजह से लागत सामग्री की तेजी से बढ़ती कीमतों के कारण बदहाल है। सरकारी खरीद के खात्मे तथा घरेलू बाजार के अंतर्राष्ट्रीय बाजार के साथ बढ़ते एकीकरण की वजह से कृषि उत्पादों के मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव के फलस्वरूप किसानों में कर्जदारी की बढ़ती प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। वहीं मुनाफाकेंद्रित बैकिंग क्षेत्र द्वारा कृषि ऋण को कम प्राथमिकता देने के कारण सूदखोरी पर बढ़ती निर्भरता ने हालात को और बदतर बना दिया है। लघु-सीमांत किसान तथा भूमिहीन मजदूर इस मार के सबसे बदतरीन शिकार हैं, जिन्हें घटी हुयी खाद्यान्न उपलब्ध्ता के कारण लगातार कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें आजीविका की तलाश में बड़े व छोटे शहरों के आसपास झुग्गी इलाकों में अत्यंत निम्न स्थितियों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जमीन ग्रामीण परिवारों के हाथ से निकलकर बड़े पैमाने पर दूसरों के हाथ जा रही है। जहां सेज कानून सरकार द्वारा संचालित खुला हमला है, वहीं बाजार की शक्तियों ने अधिक विनाशकारी लेकिन कम पारदर्शी हमला छेड़ दिया है। जिसके फलस्वरूप विकासमान शहरों तथा बड़े आधारभूत ढांचे वाली परियोजनाओं के इर्द-गिर्द जमीन के लिए बड़े पैमाने पर सट्टाबाजारी हो रही है। भूमि अधिग्रहण की नीतियों तथा कृषियोग्य भूमि के बड़े पैमाने पर गैरकृषि कार्योें के लिए उपयोग ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। छोटे पैमाने के उत्पादन व तथाकथित स्वरोजगार में लगे लोगों की फौज और सेवा क्षेत्र में लगी विराट आबादी के पास रोजगार, मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। जीवन की बुनियादी जरूरतों में भारी मूल्य-वृद्धि, सार्वजनिक स्वास्थ्य व शिक्षा के ध्वस्त होते ढांचे तथा खुदरा व्यापार, लघु-कुटीर ग्रामीण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण एवं मत्स्य उद्योग जैसे क्षेत्रों में संगठित बड़ी पंूजी के प्रवेश के कारण प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दबाब के दौर में उन्हें जिंदा रहने के लिए भी अतिरिक्त श्रम करना पड़ रहा है। मुक्त व्यापार को प्रोत्साहन देने के नाम पर उदार आयात नीतियों ने अन्यायपूर्ण प्रतिस्पर्धा में हालात को और बदतर बना दिया है। संकट ने आदिवासियों के संदर्भ में सबसे बुरा असर डाला है। जिनकी जमीन, आवास, आजीविका के लिए पहली बार ऐसा खतरा पैदा हो गया है। सरकारी तंत्र एवं देशी-विदेशी बड़ी कार्पोरेट पंूजी की मिलीभगत ने सुनियोजित ढंग से जमीन और जंगल को खनन तथा दूसरे व्यावसायिक उपयोग के लिए अधिग्रहीत कर उस पर कब्जा कर लिया है। निवेश को आकर्षित करने और ‘‘विकास’’ को तेज करने के नाम पर सरकारी नीतियों ने निर्यात के लिए खनिज संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को प्रोत्साहित किया है। इस समस्या से आंशिक निदान के लिए बने पंचायतों में अनूसूचित क्षेत्रों के विस्तार का कानून ;च्म्ै।द्ध और वनाधिकार कानूनों पर आमतौर पर अमल ही नहीं हुआ है। देर से उठाए गए अन्य सुधारात्मक उपायों जैसे राहत और पुनर्वास के प्रावधानों पर बने कानून और भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से कोई खास वास्तविक राहत नहीं मिलनी है। दशकों से जमा आक्रोश फूट रहा है। साफ है कि आदिवासियों का न सिर्फ मौजूदा सरकारों से बल्कि भारतीय राज्य से ही जबर्दस्त मोहभंग हुआ है। हालात इतने विस्फोटक न हुए होते यदि सत्ता प्रतिष्ठान शुतुरमुर्गी अंदाज में सच्चाई को महज अनदेखा करता रहता। भारतीय प्रायद्वीप के खनिज सम्पन्न और वन क्षेत्रों के मूल निवासियों के प्रतिरोध के कारण जब शासक वर्गों द्वारा लागू किये जा रहे विकास के माडल की बुनियाद के लिए ही खतरा पैदा हो गया तब सत्ता प्रतिष्ठान सच्चाई से आंख मूंदे नहीं रह सकता था। अब नकार की मुद्रा से आगे निकलकर वह समस्या को स्वीकार तो कर रहा है, लेकिन ”आतंरिक सुरक्षा“ के चश्मे से। और अब ”आतंरिक सुरक्षा के लिए नंबर एक खतरे“ के उन्मूलन के लिए उसने अर्द्धसैनिक बलों के जरिए अभूतपूर्व हमला बोल दिया है। बल प्रयोग के एकाधिकार का बेशर्मी से इस्तेमाल करते हुए राज्य मजदूर वर्ग एवं आबादी के सर्वाधिक हाशिए पर पड़े लोगों के खिलाफ बड़ी पूंजी के पक्ष में अपनी सारी ताकत लगा रहा है। मानवाधिकारों का हनन चरम पर है, लोकतांत्रिक मर्यादा और व्यवहार का तेजी से क्षरण हो रहा है।

3. पिछले दो दशक आर्थिक क्षेत्र में नव-उदारवादी सुधारों के साथ ही साम्प्रदायिकता के उभार के भी साक्षी हैं। शासक वर्गों ने चार दशक से चली आ रही स्वतंत्र, गुटनिरपेक्ष एवं दक्षिण-समर्थक विदेश नीति की विरासत को तिलांजलि दे दी है और वे खुलेआम अमरीका-इजराइल धुरी के साथ रणनीतिक संश्रय के पक्ष में आ खड़े हुए हैं। उन्होंने ”सभ्यताओं के संघर्ष“ तथा ”आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध“ के अमेरिकी-इजराइली नवअनुदारवादी तर्क तथा प्रचार को आत्मसात कर लिया है। उन्होंने न सिर्फ हमारे अनूठे स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक विरासत को तिलांजलि दे दी है, वरन वे साझी भारतीय राज्यव्यवस्था की अखंडता और वजूद के लिए ऐसे रुख के विस्फोटक परिणामों के प्रति भी उदासीन लगते हैं। पहले ही शासक वर्गों के इस रुख ने अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता दोनों के पुर्नउभार को जन्म दिया है। इसकी अभिव्यक्ति किसी भी आतंकी हमले के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं के प्रति संदेह वाले रवैये में देखी जा सकती है। यह जम्मू कश्मीर की जनता की वैध लोकतांत्रिक आंकाक्षाओं खासकर युवाओं के प्रति लगातार गलत बर्ताव, बारंबार बड़े पैमाने पर सेना की तैनाती के फलस्वरूप लोकतांत्रिक अधिकारों में जबर्दस्त कटौती और राजनीतिक दायरे के तेजी से सिमटते जाने में भी प्रकट होता है। सबसे बुरी अभिव्यक्ति शासक वर्गों के कुछ हिस्सों में कश्मीर को महज भूराजनीति की रणनीतिक जरूरतमात्र अथवा उससे भी बदतर महज जमीन का एक टुकड़ा समझने की प्रवृत्ति है।

4. इस पूरे विकासक्रम का कुल परिणाम जनवादी अधिकारों तथा स्वतंत्रता का अभूतपूर्व क्षरण है। हमने पिछले कुछ वर्षों में मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने हेतु नए-नए कानून बनाने की कोशिशें देखी हैं। सभी राज्यों में इन कानूनों के दुरुपयोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं। सर्वोपरि, हम ”आतंकवादी खतरे“ अथवा ”आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरों“ का मुकाबला करने के नाम पर भारी पैमाने पर ‘‘एनकांउटर हत्याओं’’ के गवाह बन रहे हैं। नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन के अपने अनिवार्य परिणाम हैं। यह बढ़ती हुयी गैरबराबरी और ध्रुवीकरण को जन्म दे रहा है। इसका परिणाम है लुटेरा पंूजी संचय। यह आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में व्यापक जनसमुदाय को अलगाव और हाशिये पर ढकेल रहा है। यह शासक वर्गों को इन नीतियों के क्रियान्वयन से पैदा होने वाले आक्रोश को संभालने के लिए अधिकाधिक बल प्रयोग को बाध्य कर रहा है। न्यायपालिका और मीडिया जैसी राज्य तथा राजनैतिक तंत्र की तमाम संस्थाएं, जिन्हें लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का रक्षक एवं जनपक्षीय नीतियों के क्रियान्वयन में सहयोगी माना जाता था, के भी अधिकाधिक हिस्से नव-उदारवाद के अनिवार्य तर्क के प्रभाव में आते जा रहे हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाने तथा जनवादी अधिकारों पर हमलों को वैध ठहराने हेतु नव-उदारवादी नीतियों का तर्क उग्र क्षेत्रीय, अंधराष्ट्रवादी संकीर्ण झगड़ों को शह देता है।

5. सत्तारूढ़ पार्टी तथा मुख्य विपक्ष दोनों ही प्रमुख अंतर्विरोध के अस्तित्व को ही नकारने में एकमत हंै। वह दोनों नव-उदारवाद के अनिवार्य तर्क को नकारने अथवा मान्यता देने में भी एकराय हैं। दोनों ने ही आदिवासी क्षेत्रों तथा कश्मीर घाटी में उभरते गहरे संकट पर एकसमान प्रतिक्रिया की है। मुख्यधारा की इन राजनीतिक पार्टियों ने सचेत अथवा अचेत ढंग से इन मुद्दों पर राजनीति को निष्प्रभावी बना दिया है। सत्तारूढ़ पार्टी ने अपनी ही जनता के विरुद्ध एक तरह से युद्ध छेड़ दिया है; यह एक तरह से माओवादियों द्वारा राजनीति के निषेध के ही समतुल्य है। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा एवं इसके वैचारिक केन्द्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ युद्धक मुद्रा में और भी उछलकूद मचाते हुए जोरशोर से सरकार के समर्थन में उतर पड़े हैं। शासक पार्टी और मुख्य विपक्ष अमरीकी-इजराइल प्रभुत्व को स्वीकार करने वाली अपनी एकसमान नीतियों तथा साम्प्रदायिकता के पुर्नउभार के बीच के रिश्ते को समान रूप से नकारने में लगे हैं। जहां विपक्ष कश्मीर के मुद्दे पर अधिक तीखी मुद्रा अख्तियार किये है वहीं सत्तारूढ़ पार्टी भी अंतर्वस्तु में कम आक्रामक नहीं है लेकिन वह इसकी अभिव्यक्ति में संयम बरतती है। जहां मुख्यधारा का वामपंथ प्रमुख अंतर्विरोध तथा नवउदारवादी नीतियों के अनिवार्य तर्क को स्वीकार करने में विश्लेषणात्मक व विचारधारात्मक स्पष्टता और बौद्धिक ईमानदारी दिखाता है, वहीं अपनी संसदीय ताकत में तीखी गिरावट तथा भारतीय राजनीति में सीमित पहंुच के कारण राजनीतिक धरातल पर इसकी प्रतिक्रिया जरूरत के अनुरूप नहीं है। वामपंथ के अन्य संगठन बेहद बिखरे हुए और कमजोर हैं। क्षेत्रीय पार्टियों की इन बुनियादी विषयों पर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं है अथवा अपनी अवसरवादी सुविधा के हिसाब से वे सत्तारूढ़ पार्टी या मुख्य विपक्षी पार्टी की दिशा का ही अनुसरण करती हैं। क्या हम एक राजनैतिक ठहराव, बदलाव की राजनीति, जिससे कि हम परिचित और जिसकी आजाद भारत में हमने उम्मीद की थी, के ‘‘अंत’’ की शुरुआत को देख रहे हैं? मौजूदा संगठित राजनैतिक संरचनाओं और उनकी भूमिका के लिहाज से देखने पर राजनैतिक परिदृश्य उत्साहवर्धक नहीं है लेकिन आशा की किरण जमीनी स्तर पर बढ़ते लोकप्रिय प्रतिरोध के रूप में साफ तौर पर देखी जा सकती है। जन संघर्ष स्थानीय तौर पर और राष्ट्रीय स्तर पर भी उभर रहे हैं। चाहे छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, कर्नाटक की खनन कम्पनियों की लूट हो, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र या गोवा में बड़ी पंूजी द्वारा व्याप्क स्तर पर भूमि हड़पो अभियान हो, राजस्थान में पानी प्राप्त करने का किसानों का अधिकार हो या और भी व्यापक स्तर पर बुनियादी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि सम्बंधी सरकार की पूरी तरह संवेदनहीन और पंूजीपरस्त नीतियां हों- जनता हर कहीं उठ खड़ी हो रही है और जोरदार लड़ाईयां छेड़ रही है। समय-समय पर जनांदोलनों ने, जिनमें से कुछ काफी हद तक अराजनैतिक हंै, इन संघर्षों का सर्मथन किया है। कभी-कभी विपक्षी राजनैतिक पार्टियों ने भी इनका नेतृत्व किया है या वे इसमें शामिल हुई हैं। लेकिन अधिकांशतः यह बस लक्षणों को पकड़ने की बात है; यह पेड़ को देखना है लेकिन जंगल को नहीं। इस सबके बावजूद जनता ने अपनी कार्रवाइयों में दृढ़ता और हिम्मत का परिचय दिया है। यही वह भावना है, वह संभावनामय राजनैतिक ताकत है, जो व्याप्त राजनैतिक गतिरोध को भंग करेगी और बदलावमूलक राजनीति को जीवनशक्ति प्रदान करेगी।

6. बदलावमूलक राजनीति को नवजीवन देना और राजनैतिक जमीन को पुनर्सृजित, समृद्ध और व्यापक बनाना हमारे दौर की चुनौती है । नव-साम्राज्यवाद की हिरावल वित्तीय पूंजी के वैश्विक उभार तथा शासक वर्गों द्वारा इस ताकतवर वैश्विक शक्ति के साथ मजबूती से खड़े होने के फैसले ने चुनौती को और कठिन बना दिया है, जिसके सुस्पष्ट आर्थिक और रणनीतिक निहतार्थ और दबाव हैं। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि देश की भावी राजनीति और वस्तुतः भावी लोकतंत्र के लिए भी इसके गम्भीर निहितार्थ हैं। आर्थिक नीतियों के नव-उदारवादी ढंाचे को स्वीकारने का मतलब है, भूमंडलीय विकास के माडल को स्वीकार करना जो कि निर्भरशील और उतार-चढ़ाव से भरा, धुव्रीकरण और गैरबराबरी बढ़ाने वाला, आजीविका से वंचित करने वाला और पर्यावरण के लिए खतरनाक है। जैसा हमने पहले रेखांकित किया है कि हम आज ऐसे विकास की तलाश द्वारा पैदा किए गए संकट के बीच हैं। लघु उत्पादकों का दरिद्रीकरण उग्र-क्षेत्रीयतावादी विभाजनकारी ताकतों के उभार के लिए उर्वर जमीन मुहैया कराता है। आपसी झगड़ों की राजनीति बदलाव की राजनीति को पीछे ढकेल देती है। असली मुद्दों से ध्यान हटाने की वजह से शासक वर्गों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन इस प्रवृति को बल प्रदान करता है। एक अन्य स्तर पर वैश्विक पूंजी के गढ़ अमरीका के साथ रणनीतिक संश्रय और परिणामस्वरूप इजराइल के साथ गलबहियांे ने पश्चिम व मध्य एशिया के महत्वपूर्ण पड़ोसियों के साथ हमारे रिश्तों में खटास पैदा कर दी है। इसके हमारे आर्थिक एवं रणनीतिक हितों के लिए बिल्कुल ही प्रतिकूल निहितार्थ हैं। इसके फलस्वरूप भारतीय राज्य चाहे-अनचाहे ‘‘इस्लामोफोबिया’’ जिसकी जड़ें अमरीकी शासक वर्गों की नव-अनुदारवादी दृष्टि में निहित हैं और/अथवा जो पश्चिम एशिया में अमेरिका संरक्षित राज्यों के ‘‘राजनैतिक इस्लाम’’ की स्वीकृति देता है। जैसा कि हमने पहले ही उल्लेख किया है, इसके हमारी राज्य व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए खतरनाक निहितार्थ हैं। यह एक तरफ उग्रवादी (मिलिटेंट), रूढ़िवादी और साम्प्रदायिक तत्वों को अनायास बल प्रदान करने के साथ ही अल्पसंख्यक समुदाय के अंदर अलगाव और असुरक्षा की भावना को बढ़ाता है तो दूसरी ओर बहुसंख्यक साम्प्रदायिक फासीवादी राजनीति को आवेग प्रदान करता है। यह दोनों ही कारक हमारे राजनैतिक जीवन में फासीवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में जारी गहरे संकट के प्रति शासक वर्गों की रक्तरंजित प्रतिक्रिया, 2002 में गुजरात में साम्प्रदायिक जनसंहार के दौर में बेहद घुटनाटेकू भूमिका या मौजूदा दौर में मुंबई में आंचलिक उन्माद की ताकतों की गुण्डागर्दी के प्रति अगर सहमति नहीं भी तो उस पर मौन स्वीकृति यही दिखाती है कि हमारा शासक वर्ग कितनी आसानी से फासीवादी रास्ते को मौन सहमति दे सकता है अथवा सीधे उस रास्ते पर उतर सकता है। श्रेणीबद्ध और अन्यायपूर्ण जातिव्यवस्था के अंतर्निहित पूर्वाग्रह तथा ब्राह्मणवादी संस्कृति के अहंकार (दलितों की बढ़ती राजनैतिक दावेदारी या पिछड़ों के आरक्षण पर उच्च जातियों/वर्गो की विषाक्त प्रतिक्रिया) ने ऐसी फासीवादी प्रवृत्तियों के जड़ जमाने और फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण मुहैया कराया है, खासतौर से तब जब इसके अगुआ एक महाशक्ति के साथ होने के विश्वास से भरे हों।

7. इस राजनैतिक गतिरोध को खत्म करने, हमारे राज्य व्यवस्था के फासीवादी रास्ते पर अंततः चल पड़ने अथवा इसके पूर्ण बिखराव को रोकने के लिए क्या करें? बदलाव की राजनीति को पुनर्जीवित करने की रणनीति के तत्व क्या होंगे? हमारा मानना है कि एक राजनैतिक आंदोलन, जो कि अपनी संरचना में समावेषी होने के साथ दृष्टिकोण में रेडिकल हो, को संचालित करने के लिए एक व्यापक लोकतांत्रिक मंच का निर्माण हमारे दौर की मांग है। ऐसा आंदोलन ही शासक वर्गों द्वारा, जिन्हांेने वस्तुतः पक्ष और विपक्ष दोनों राजनैतिक जमीनें ;ेचंबमद्ध कब्जा कर रखी हैं, आधुनिक भारतीय राज्य व्यवस्था के स्वप्न के खिलाफ छेड़े गए संयुक्त हमले का मुकाबला करने और उसको शिकस्त देने में सक्षम होगा। इस मांग को पूरा कर पाने में हमारी विफलता न सिर्फ जनपक्षीय प्रगतिशील राजनीति के अंत की शुरुआत होगी बल्कि जनवादीकरण की प्रक्रिया को ही लकवाग्रस्त कर देगी। जिसके राजनीतिक पार्टियों के चुनावी भविष्य की तुलना में अधिक दूरगामी महत्वपूर्ण निहितार्थ होंगे; जिसके हमारी राजनैतिक अखंडता के अस्तित्वतात्र के लिए निहितार्थ होंगे; जिसके एशिया और अफ्रीका में चले ऐतिहासिक लोकप्रिय संघर्षों, जिन्होंने उपनिवेशवाद का अन्त किया और जो आज भी नव-साम्राज्यवाद की आक्रामक मुहिम के खिलाफ जारी है, के भविष्य के लिए भी इसके बेहद प्रतिकूल निहितार्थ होंगे। हमारा मानना है कि कृषि पर कार्पोरेट कब्जे को शिकस्त देना, भूमि, जल, बीज, जंगल और खनिजों के निगमीकरण का प्रतिरोध करना और इन बुनियादी संसाधनों के समाजीकरण की ओर बढ़ना, रैडिकल एजेण्डा के दो केन्द्रीय तत्वों में से एक होगा। दूसरा केन्द्रीय तत्व नव-साम्राज्यवाद की रणनीतिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक सभी अभिव्यक्तियों के खिलाफ समझौताविहीन प्रतिरोध होगा। हमारा मानना है कि मौजूदा संदर्भ में मंच के समावेशी होने की कसौटी आमतौर पर किसानों व मजदूरों तथा खासतौर पर मुस्लिम, दलित, आदिवासियों एवं अति पिछड़ों में इसकी अपील होगी। कोई भी मंच रैडिकल के साथ ही समावेशी होने का दावा तब तक नही कर सकता है, जब तक कि वह राजनीति के इन तत्वों को बेहिचक और खुलकर शामिल नहीं करता है। राजनैतिक एजेण्डा में उनके हितों की रक्षा की स्पष्ट घोषणा को अनिवार्यतः शामिल करना होगा और इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि प्रत्येक स्तर पर सत्ता संरचना में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना होगा। हमारा मानना है कि समावेशी गैरसंकीर्ण लोकतांत्रिक राजनैतिक मंच को अनिवार्य रूप से संघीय चरित्र का होना चाहिए अर्थात समान विचार के सभी राजनैतिक संरचनाओं, संगठन, समूह, आंदोलन, व्यक्ति जो यहां दिए विश्लेषण, दृष्टिकोण और नीतियों से सहमत है, उन्हे मंच में शामिल करने के लिए आग्रह किया जाना चाहिए ताकि एक ऐसा नया संघीय राजनैतिक समूह उभर सके जो जारी संघर्षो को बल प्रदान करे तथा नए संघर्ष छेडे़, ताकि मौजूदा संकट को जन्म देने वाली राजनीति व नीतियों को शिकस्त दी जा सके। प्रस्तावित मंच के संघीय चरित्र में शामिल होने वाले राजनीतिक संगठनों की पहचान और कार्यपद्धति का सम्मान करना होगा और सांगठनिक अथवा चुनावी राजनीति, किसी भी स्तर पर जाहिराना तौर पर उनका प्रतिस्र्पद्धी नहीं बनना होगा। हमारा मानना है कि इस रेडिकल एजेण्डा को लागू करने की रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर बनानी होगी और उसे व्यवहार में उतारना होगा, लेकिन इसे अलग-थलग ढंग से वैश्विक संदर्भ में अंतर्विरोधों, संकटों तथा संभावित दोस्तों या दुश्मनों की अनदेखी करके नहीं बनाना होगा। शासक वर्गो ने इसे आत्मसात किया है और वैश्विक संदर्भ में अपने दोस्तों के साथ संश्रय कायम किया है। राष्ट्रीय रणनीति के विकास में वैश्विक संदर्भ तथा एकजुटता अगर निर्णायक नहीं भी हों तो भी अधिकाधिक महत्वपूर्ण होती जा रहे हैं। इसलिए प्रमुख वैश्विक अंतर्विरोधों जैसे उत्तर बनाम दक्षिण, वैश्विक विकास बनाम पर्यावरण को खतरा और फलती-फूलती कार्पोरेट पंूजी बनाम मजदूर वर्ग, हाशिए पर ढकेले गए गरीब व बेरोजगार- के संदर्भ में अपने एजेण्डा के रणनीतिकरण में निश्चित ही हमें दक्षिण, पर्यावरण की रक्षा, मजदूर वर्ग, सीमान्त और बेरोजगार गरीबों के पक्ष में होना होगा।

8. हमारे दृष्टि ;टपेपवदद्ध की बदलावमूलक राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए कौन से नीति विषयक लक्ष्य ग्रहण किए जाने चाहिए?

महत्वपूर्ण क्षेत्रों से सम्बंधित हम बारह सूत्री प्राथमिकता सूची प्रस्तावित कर रहे हैं-

- जनवादी अधिकारों और स्वतंत्रता पर हमले को शिकस्त देना और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून समेत सभी विशेष कानूनों का, जो संविधान प्रदत्त लोकतांत्रिक दायरे को सीमित करते हैं और राज्य को बल प्रयोग के एकाधिकार का दुरुपयोग करने में सक्षम बनाते हैं, खत्म करने के लिए संघर्ष।

- कृषि पर कार्पोरेट कब्जे को विफल करना, भूमि, जल, बीज, जंगल, खनिजों के निगमीकरण का प्रतिरोध करना, इन मूलभूत संसाधनों के समाजीकरण की ओर बढ़ना।

- सामुदायिक संसाधनों विशेषकर जंगल और आदिवासी इलाकों और उनकी जमीन में कार्पोरेट अतिक्रमण तथा कब्जे को विफल करना, आदिवासी सामुदायिक अधिकारों तथा आजीविका की रक्षा करना, सामुदायिक मालिकानों और वन संसाधनों के प्रबंधन को प्रोत्साहित करना, उन नीतियों को शिकस्त देना जो खनिज संसाधनों की कार्पोरेट लूट को बढ़ावा देती हंै और आदिवासियों के जीवन, आजीविका और आवास का विनाश करती हंै।

- कृषि विषयक डब्लू.टी.ओ/ कृषि विषयक समझौते को शिकस्त देना, कृषि उत्पादन और व्यापार में दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए किसान केन्द्रित विकल्प के लिए संघर्ष।

- वैकल्पिक विकास नीतियों के लिए संघर्ष जो न सिर्फ ‘‘वैश्विक विकास’’ की मुख्यधारा की रणनीति को नकारेगी बल्कि आत्मनिर्भरता व्यक्तियों के बीच, वर्गांे के बीच (शैक्षिणिक व सामाजिक रूप से पिछड़े व अगड़े वर्गों के अर्थ में) अंतक्र्षेत्रीय बराबरी और पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करेगी, इसका अर्थ होगा औद्योगीकरण के ढंाचे की दिशा का पुनर्निर्धारण। ”इसका अर्थ होगा वैश्विक दृष्टि से प्रतिस्पर्धी“ उद्योगों के मौजूदा मोह से अलग होना और रोजगारपरक व जनोपयोगी दिशा वाले उद्योगों की ओर बढ़ना।

- स्वास्थ्य एवं शिक्षा को तेजी से माल में तब्दील करने की प्रक्रिया का अन्त और भोजन व अन्य जरूरी चीजों तक जनता की पहुंच तथा मौजूदा भेदभावमूलक महंगे और सीमित पहुंच वाली व्यवस्था की जगह स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन और अन्य जरूरी चीजों के प्रावधान के लिए सर्वांगीण समतापरक, सुलभ सार्वजनिक प्रणाली की स्थापना।

- सामाजिक रूप से वंचित वर्गों व समुदायों के लिए निजी और सरकारी क्षेत्रों में शिक्षा व स्वास्थ्य में विशेष अवसरों की कानूनी गारंटी।

- विभिन्न क्षेत्रों व वर्गों के बीच असमानता में भारी कमी करने वाली राष्ट्रीय वेतन और आय नीति। भारतीय वित्तीय व्यवस्था की स्वायत्तता को मजबूत करना तथा इसे वैष्विक पंूजी की दुर्बलता और लालच से बचाना, आंचलिक वित्तीय सहयोग जैसे क्षेत्रीय मौद्रिक संघ के लिए संघर्ष।

- अमरीकी रणनीतिक संश्रय से निर्णायक अलगाव और अमरीकी सैन्यवाद का विरोध, विशेषकर पश्चिम एशिया में अमरीकी-इजराइली सैन्यवाद और अमेरिका प्रायोजित इस्लामोफोबिया का पर्दाफाश करना और उसे शिकस्त देना।

- एक नयी ऊर्जा नीति जो हमारे रणनीतिक कृषि व औद्योगिक नीतियों की नयी दिशा के अनूरूप हो। तेल, गैस से समृद्ध पश्चिम एशिया व मध्य एशिया के देशों के साथ चुनिंदा रणनीतिक सहयोग, शंघाई सहयोग संगठन के साथ घनिष्ठ सहयोग।