(आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के सितम्बर 2018 को दिल्ली में आयोजित सम्मेलन के बाद स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेंद्र प्रताप सिंह की जनचौक के सम्पादक महेंद्र मिश्र से बातचीत)

आरएसएस की दृष्टि और स्वभाव में नहीं हुआ है कोई बदलाव

मोहन भागवत के तीन दिन के सम्मेलन के बाद कई तरह की टिप्पणी दिख रही है। उसमें जो मुझे दिखता है एक तो मैं उन लोगों का विचार सुन रहा हूं जो लोग आरएसएस को सिद्धांत और व्यवहार के रूप में बहुत करीब से देखते हैं। उनका ये मानना है कि आरएसएस ने यह दरअसल भ्रम पैदा करने के लिए किया है और इसमें ये समझना कि कोई बदलाव है खुद को भ्रम में रखने जैसी बात होगी। वो लोग भागवत के इस कनक्लेव को बहुत महत्व नहीं दे रहे हैं और आमतौर पर खारिज कर रहे हैं। एक ये भी नजर है कि संघ ने बड़े बदलाव की तरफ इशारा किया है और उस तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है। 

मुझे जहां तक लगता है संघ की जो दृष्टि है और उसका जो स्वभाव है उसमें कोई बदलाव नहीं है। लेकिन संघ की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति जरूर है जो अपने में खासतौर पर संविधान और संसदीय राजनीतिक व्यवहार के बारे में एक नई अभिव्यक्ति है जिसे देखने की जरूरत है। संघ का यह एहसास कि भारत में संविधान के पीछे केवल उदारपंथियों की नहीं बल्कि सामाजिक शक्तियों की भी एक बड़ी ताकत है और अभी तक की जो संसदीय व्यवस्था है उसमें संसदीय प्रणाली राष्ट्रपति प्रणाली से बेहतर है। इसलिए इन दोनों को उसने स्वीकार किया है और मैं समझता हूं कि पहली बार संघ ने स्पष्ट तौर पर इसको स्वीकार किया है। 

इसमें शासन करने के लिए एक राजनीतिक मंच (बीजेपी) द्वारा उसने जो शासन किया उस व्यवहार से भी उसे एक नई सीख मिली। संघ ने ये माना है कि संविधान और संसदीय राजनीति जैसी चल रही है वैसे चलने दिया जाए। जहां तक उन्होंने हिंदुत्व की बात की है, अल्पसंख्यकों के मामले में गुरु गोलवलकर के विचारों को बदलने की बात की है तो उसमें कोई मौलिक बदलाव नहीं है। क्योंकि मूल प्रश्न ये नहीं है कि वो मुसलमान को स्वीकार करते हैं या नहीं करते हैं। मुसलमानों को वो सशर्त पहले भी स्वीकार करते थे आज भी स्वीकार करते हैं। उनका मानना है कि हिंदुस्तान में मुसलमानों को अपने पूर्वजों का, अपनी परंपरा का, अपनी संस्कृति का सम्मान करना पड़ेगा, उसे स्वीकार करना पड़ेगा।

जैसा कि उनके प्रेरणास्रोत सावरकर या फिर गुरूजी के विचार रहे हैं। वो इस बात को भी ले आते हैं कि आपको इसे पितृभूमि ही नहीं बल्कि पुण्यभूमि भी मानना पड़ेगा। ये जो उनका सैद्धांतिक सूत्रीकरण है। इस पर वो अभी भी अडिग हैं। संघ की इस मूल दृष्टि में कोई बदलाव नहीं हुआ है। गैर हिंदुओं पर ये सांस्कृतिक दबाव वो बनाए रखना चाहते हैं। अब इसमें उन्होंने समझाने और बल प्रयोग की दोनों पद्धतियों को स्वीकार किया है लेकिन अंतिम पद्धति उनकी हमले और बल प्रयोग की है। वो मानते हैं कि हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए प्राण देना और प्राण लेना उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है। 

समाज का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण जैसी जो उनकी कुछ मूल स्थापनाएं हैं इसको वो मानते हैं। जिस दिन संघ पुण्यभूमि और पितृ भूमि के  झगड़े को खत्म कर देगा। मातृभूमि के तौर पर सब लोग तो इसे स्वीकार ही करते हैं। लेकिन उनका जो सांस्कृतिक दबाव है, राजनीतिक दबाव है पुण्यभूमि मानने का। जिस दिन वो इस विचार से अपने को अलग करेंगे तब फिर आरएसएस के बने रहने का या फिर उनके हिंदुत्व के बने रहने का औचित्य ही खत्म हो जाएगा।

इसीलिए अपने कारण का निषेध करके और फिर उसका कोई आधार ही न रहे वो नहीं चल सकते हैं। भारत वर्ष को हिन्दू राष्ट्र में बदलने की एक लंबी लड़ाई है जो संघ लड़ना चाहता है. तात्कालिक तौर पर संघ सरकार की दृष्टि से ये जरूर महसूस करता है कि उनका बहुत सारी सामाजिक शक्तियो से अलगाव हैं और शासक वर्ग का एक एलीट हिस्सा भी उन पर शक करता है. इसलिये यहां पूंजी निवेश करने में डर लगता है, उनको भी संघ ने आश्वस्त करना चाहा है कि वे पुराने विचार के नहीं है मोब लिंचिंग के खिलाफ है और समाज में एक अच्छा माहौल बनाना चाहते है। संघ  आश्वस्त करना चाहता है कि उसके लोग कानून का सम्मान करते है और ऐसा कुछ नहीं है करेंगे जो कानून के दायरे के इतर हो। लेकिन यहां भी उनका एक अंतरविरोध है. पूरे वक्तव्य में जहां से उन्होंने शुरूआत की थी और अंत में जहां उन्होंने उसे खत्म किया। उसका उन्होंने निषेध कर दिया। उन्होंने कहा कि कानून का राज होना चाहिए इसको स्वीकार करते हैं लेकिन अब कह रहे हैं कि किसी भी तरीके से मंदिर बनवाओ। ये मुख्यरूप से उसी का निषेध है। 

सर संचालक कह सकते थे कि जो लोग राजनीति कर रहे हैं ये उनका मामला है, वही देखेंगे या फिर मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और वहां से जो भी फैसला होगा, देखा जाएगा। लेकिन किसी भी तरीके से बनवाओ ये जो आग्रह है, ये किन कारणों से हो सकता है, ये आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। या हो सकता है कि ये लोग अपनी कांस्टीट्यूंसी को मेसेज दे रहे हों कि राम मंदिर हमारे लिए केवल नारेबाजी का मुद्दा नहीं है, हम इसको गंभीरता से ले रहे हैं और दूसरा ये भी मेसेज दे रहे हों कि राममंदिर बनाया जाना चाहिए और नई राजनीतिक परिस्थिति में खड़ा होकर 2019 के चुनाव में मुद्दा बनाया जा सकता है।

जहां तक उन्होंने हिंदुत्व की व्याख्या की है। हिंदू जो धर्म है उसका हिंदुत्व से कुछ लेना-देना नहीं है। हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है। लेकिन वो जो बंधुत्व की परिभाषा हिंदुत्व में देखते हैं वह मूलतः तर्क विरोधी और आस्था पर आधारित है और विश्व बंधुत्व में समानता, स्वतंत्रता की जो आधुनिक अवधारणा है वह मूलतः उससे अलग है। संघ हर चीज आस्था के नाम पर लोगो के ऊपर थोपता है। भारत में आस्था का संकट नहीं है. यहां तर्क, विवेक और वैज्ञानिक सोच का संकट है। ज्ञान हमारे देश में विकसित हो इसलिए ऐसा हिंदुत्व जिसमें तर्क के लिए, विज्ञान के लिए, विवेक के लिए जगह नहीं हो उस तरह के हिंदुत्व को विश्व बंधुत्व कहकर आप उसका चरित्र जो गैर वैज्ञानिक है गैर मानवीय है, का महिमांडन कर रहे हैं। 

जनराजनीति के बारे में भी इनकी कोई धारणा स्पष्ट नहीं है। इनकी कोशिश जरूर रहती है कि डा. अंबेडकर से लेकर गांधी तक को ये समाहित कर लें। ये भगत सिंह पर भी अपना दावा ठोकते है लेकिन उनके विचार से इनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है. डा. अंबेडकर आधुनिक वैज्ञानिक व्यक्ति हैं उनको भी ये अपने ढाचे में ढालना चाहते है. फ्रांस क्रांति के स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व के मूल्य को नकारने के लिए उसके विरूद्ध बौद्ध धर्म में प्रतिपादित स्वतंत्रता बंधुत्व के मूल्य को संघ खड़ा करता है. इसके जरिये वो डाक्टर अंबेडकर के बारे में अपनी समझ को लोगो के ऊपर थोपते हैं। जबकि सभी लोग यह जानते है कि डा. अंबेडकर एक आधुनिक भारत बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे और वो ज्यादा जोर दलितों पर इसलिए देते हैं क्योंकि बिना उनको गोलबंद किए एक स्वतंत्र व्यक्ति का आविर्भाव नहीं हो सकता है। एक नागरिकता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता है क्योकि जातीय बंधन में बांधकर दलितों को मनुष्य बनने के अधिकार से ही वंचित कर दिया गया। इसलिए वो उस समाज को साथ लेने की बात करते हैं।

      डा. अंबेडकर ही नहीं गांधी जी भी वर्ण व्यवस्था के पक्ष में जो हिंद स्वराज में लिखते हैं, 1947 आते-आते वो उसमें सुधार नहीं बल्कि जाति तोड़क की भूमिका में आ जाते है। तो गांधी का निरंतर विकास हो रहा है। संघ के लोग कभी भी गांधी को पचा नहीं पाएंगे। प्रस्तावना जो संविधान की आधारशिला है जिसे नेहरू ने प्रस्तावित किया और ड्राफ्ट कमेटी जिसने डा. अंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान को तैयार किया, गांधी उसकी आत्मा हैं। इसलिए लोकतांत्रिक अधिकार से लेकर नीति निर्देशक तत्व तक ये सब बाते हैं, इसमें गांधी का आधुनिक विचार दिखता है जो नेहरू और डा. अंबेडकर जैसे लोगो के माध्यम से सामने आता है।

 

      इसलिए संघ द्वारा गांधी और नेहरू के बीच कोई अंतर्विरोध तलाशना बेमानी है। दोनों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किए जाने की कोशिश संघ द्वारा की जाती है। ये भी दांव लगाते हैं और कभी गांधी को नेहरू तो कभी नेहरू को गांधी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करते हैं। दरअसल ये नेहरू के माध्यम से गांधी को हराना चाहते हैं और इनकी भी मूल मंशा गाँधी के विचार को ध्वस्त करने की रहती है. नाथू राम गोडसे इन्ही के विचारो की उत्पत्ति है जिसने गाँधी की हत्या की. आरएसएस के लोग चाणक्य की नीति के अनुसार कर्म करने की दीक्षा देते है लेकिन चाणक्य की नीति की मर्यादा इनमे नहीं है. चाणक्य की नीति में भी एक सोशल मोरलिटी है एक सामाजिक नैतिकता है। यह सामाजिक नैतिकता संघ में नहीं है। क्योंकि संघ में आप देखिएगा कि किस तरह से खुद में संघ के मूल स्रोत के विचारक सावरकर अपनी रिहाई के मामले में ब्रिटिश राज से कैसी क्षमा याचना करते हैं। खुद देवरस ने इमरजेंसी के दौरान क्या-क्या किया, सब को पता है.

       हां संघ में एक धारा जरुर रही है जिसमें नाना जी देशमुख जैसे लोग रहे है उन्होंने लोहिया से लेकर गांधी को इस समझ से स्वीकार किया कि बिना इन लोगो को लिए हम भारत वर्ष में नहीं बढ़ सकते हैं। लेकिन यह उनकी इन लोगो के बारे में कार्यनीतिक समझ है न कि उनके मूल समझ और स्वभाव में. दरअसल संघ परिस्थितियों के हिसाब से समय-समय पर अपनी मूल दृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए कार्यनीतिक समायोजन करता रहता हैं।

     मोहन भागवत सम्मेलन में जो कह रहे हैं उससे जो मुख्य बात निकलती हैं वह यह है कि सामाजिक दबाव में उन्होने संविधान में दिए गए सेकुलरिज्म और समाजवाद को स्वीकार किया है और राष्ट्रपति प्रणाली की जगह संसदीय प्रणाली के पक्षधर बने हैं। इस संदर्भ में ये बात जरूर देखना होगा कि संघ ने उन लोगों के लिए मुश्किल खड़ा कर दिया है जो हिंदू-हिंदू खेल में लगे हुए हैं। जैसे कांग्रेस का पूरा ये खेल था कि संघ कट्टरपंथी हिंदू और हम उदारवादी, सनातनी हिदू है। आरएसएस ने कांग्रेस के इस स्पेस को कम किया है और कम से कम अवधारणा के स्तर पर ये बहस चला दिया है कि संघ के लोग सनातनी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसने उनके लिए भी और जो लोग समाजशास्त्र को अर्थनीति से अलग-थलग करके इनको वास्तविक हिंदू धर्म का प्रतिनिधि नहीं मानते उनके लिए भी चुनौती खड़ा कर दिया है। संघ ने अपने कैनवास को बड़ा किया है जिसमें धर्म में अपने को सनातनी कहते हैं और राजनीति जो हिंदुत्व की विचारधारा है उसको सर्वजनीन विश्व बंधुत्व से जोड़ते हैं या फिर उसकी कोशिश करते हैं।

      मैं समझता हूं कि इनका पूरा राजनातिक सांस्कृतिक प्रोजेक्ट पूरी तरह से एक अधिनायकवादी वैचारिक प्रक्रिया की देन है जो बहुसंख्यकवादी और वर्चस्ववादी है. यह बुनियादी तौर पर लोकतंत्र विरोधी है। जिसमें आधुनिक नागरिक बोध नहीं है, माडर्न, सिटीजनशिप की अवधारणा नहीं है। समाज के सेकुलराइजेशन के विरूद्ध हैं। मूलत: ये लोकतंत्र विरोधी विचार है और इसका जवाब सुसंगत लोकतांत्रिक पद्धति से ही दिया जा सकता है। लोकतंत्र की व्याख्या केवल सामाजिक संदर्भों में ही नहीं बल्कि उसकी आर्थिक व्याख्या भी की जानी चाहिए। संघ के राष्ट्रीय अर्थ नीति और समाज शास्त्र को समग्रता में देखने की जरुरत है. कार्पोरेट अर्थनीति और हिंदुत्व के संबंधो को और गहराई के साथ देखने की जरुरत है जिसकी न केवल सामान्य उदारवादी बल्कि दलित बहुजन दृष्टि के उदारपंथी अनदेखी कर देते है.  

स्वदेशी के मामले में भी संघ पूरी तरह से बेनकाब हुआ है, पीछे हटा है। साम्राज्यवाद विरोध का जो पर्दा लगा रखा था उसे हटा लिया है। एक नई राष्ट्रीय अर्थ नीति की जरुरत है, नई राष्ट्रीय अर्थ नीति के निर्माण के लिए देश में पूंजी निर्माण, तकनीकी और आंतरिक बाजार को विकसित करना होगा, आधुनिकता और नागरिकता के विरूद्ध जो सामंती अवशेष बचे है उन्हें हटाना होगा, वित्तीय पूंजी के अधिपत्य के विरूद्ध खड़ा होना होगा. भारत को पड़ोसी मुल्कों के साथ एकताबद्ध होने की जरूरत है। 

      संघ से लड़ने और नई दृष्टि से आधुनिक भारत के निर्माण के लिए बड़े राजनीतिक प्लेटफार्म की जरूरत है. संघ के बारे में पुराना जो फार्मुलेशन है वो इनकी विचार प्रक्रिया से लड़ने की बजाय उनके कुछ भौतिक फार्मेंशन तक सीमित रह जाता है। ये थोथे स्तर पर इनका विरोध करता है। वो लोग इनसे वैचारिक स्तर पर अभी नहीं लड़ पाएंगे। जैसे कुछ लोग अभी तक कहते थे कि रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है वो अपना रजिस्ट्रेशन करा लेंगे। वो ये भी कह रहे हैं कि ग्रुप आफ इंडिविजुअल के तौर पर उनका रजिस्ट्रेशन है। ये भी कह रहे हैं कि उनका आडिट होता है। अब आप कहां खड़े होंगे?

      सवाल कुछ तकनीकी प्रश्न की जगह सामाजिक न्याय की ताकतों को भी संघ ने जो चुनौती पेश की है उसके बारे में सोचना होगा और जो दलित बहुजन दृष्टि है वो लाक्षणिक संदर्भों में ही इसका विरोध करती है। उसके सामने भी अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक व्यवस्था में एक नागरिक के अस्तित्व की स्वीकृति और उसका सेकुलराइजेशन एक बड़ा प्रश्न है और उसे  इसको हल करना होगा। 

      आज एक नये किस्म के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक ढांचे की जरूरत है। जो व्यक्ति के अस्तित्व और उसके सेकुलराइजेशन की स्वीकृति देता हो और संघ ने इस स्तर पर जो चुनौती पेश की है उसका सैद्धांतिक और व्यवहारिक स्तर पर मुख्यधारा के दल जवाब दे पाएंगे ऐसा अभी नहीं दिख रहा है। इसमें संघ के संकट को कभी भी कम मानने की जरूरत नहीं है या फिर उसे समावेशी समाज के किसी नये प्रवक्ता के बतौर नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि उनकी जो मूलदृष्टि है वो समाज के एक बड़े हिस्से को बहिष्कृत करती है और वो राष्ट्रवाद के नाम पर साम्राज्यवाद की सेवा करता है।