जीएसटी पर एस पी शुक्ला पूर्व वित्त सचिव भारत सरकार के विचार

   जब आपके पास कोई प्रेरक राजनीतिक परियोजना नहीं होती है तब दुनियादारी को क्रांतिकारी आवरण में पेश करना आपकी जरूरत बन जाती है। जीएसटी को लेकर जो माहौल बनाया जा रहा है वह ऐसी ही एक कोशिश है।

  जीएसटी का विकास दर पर क्या असर पड़ेगा उसे लेकर विशेषज्ञ उतने निश्चित नहीं है जितने कि राजनेता और मीडिया जगत। ‘एक टैक्स - एक देश की शिगूफेबाजी राष्ट्रवाद के साथ-साथ टैक्स के राजनीतिक अर्थशास्त्र के बारे में अज्ञान को बेनकाब करने का ही काम कर रही है। और भारत छोड़ो आंदोलन के योद्धाओं को नमन के साथ ही जीएसटी बिल पास होने को जोड़ने की बात तो उन्हीं के दिमाग में आ सकती है जिनका आजादी की लड़ाई से कभी कोई लेना-देना नहीं था, राष्ट्रनिर्माण की जिनकी दृष्टि कभी दुकानदारी से आगे नहीं जा सकती।

    निःसंदेह जीएसटी एक ऐसा उपाय है जो ऐसे माल और सेवाएं, जिनका उपभोग एक से अधिक राज्यों में फैला हुआ है, पैदा करने वाली बड़ी कारपोरेट पूंजी के लिए लेन-देन की कीमत घटायेगा तथा

व्यापार करना अधिक आसान बनायेगा। इससे टैक्स चोरी रुकने की भी कुछ सम्भावना है। लेकिन जहां आम उपभेक्ता की बात है, उसके ऊपर टैक्स का बोझ घटने की उम्मीद नहीं है। मुद्रास्फीति बढ़ने की सम्भावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता है। यह क्या टैक्स दर तय होती है उस पर निर्भर करेगा।

   राज्यसभा और लोकसभा द्वारा पारित बिल के प्रभाव के बारे में एक बात तय है कि राज्यों के वित्तीय प्राधिकार में उल्लेखनीय और स्थायी क्षरण होगा जो संघीय ढ़ाचे के अनुरूप संवैधनिक प्रणाली के तहत उन्हें प्राप्त था। राज्य अब राजस्व के मुख्य और इकलौते विकासमान स्रोत से वंचित हो जायेंगे जाहिर है कोई भी केन्द्रीय आर्थिक सहायता राज्यों के संविधान प्रदत्त प्राधिकार का विकल्प नहीं हो सकती। राज्य नीति निर्माण में अपनी स्वायत्ता खो देंगे अगर उनके पास अपनी नीतियों को लागू करने की वित्तीय ताकत न हो।

     जब योजना आयोग को अलविदा किया गया और केन्द्रीय या केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को बंद करने की बात हुई, तब यह तर्क दिया गया था कि राज्य ही (अपने बारे में) सबसे बेहतर समझ सकते है और उन्हें केन्द्र सरकार की सोच के ढ़ाचें से बांधा नहीं जाना चाहिए। इस तरह अब एक ऐसी स्थिति होगी जहां राज्य तकनीकी तौर पर अपना नीतिगत ढांचा और योजनाओं को बनाने के लिए स्वतंत्र होंगे लेकिन उनके पास ऐसी नीतियों या योजनाओं के लिए अपना वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए स्रोत नहीं होंगे।

      केवल एक राज्य ने बिल पर अपनी आपत्ति बरकरार रखी लेकिन इसके भी सांसदों ने बिल का विरोध नहीं किया - उन्होंने महज बहिर्गमन किया। वामपंथी सांसद तो यह भी नहीं किए। उन्होंने बिल के समर्थन में मतदान किया। अचरज की बात है कि अपनी दो राज्य सरकारों के तात्कालिक सम्भावित लाभ की उम्मीद में सिद्धांतनिष्ठ वाम इतना प्रभावित हो गया कि उसने संविधान के संघीय ढांचे की होने वाली इस अमिट क्षति को भी नजरअदांज कर दिया।

     यह सर्वविदित है कि कारपोरेट पूंजी 1991 से ही धीरे-धीरे सरकार की नीति निर्माण सम्बंधी भूमिका को हड़पती जा रही है। और तब किसी भी सरकार ने (चाहे वह जिस पार्टी या गठबंधन की सरकार रही हो) इसका प्रतिरोध नहीं किया।

       यह भी स्वीकृत तथ्य है कि मौजूदा सरकार के आने के बाद से यह प्रक्रिया नयी ऊचांई पर पहुंच गयी है। लेकिन एक ऐसे बिल का जो मुकम्मल तौर पर और इतनी बेशर्मी के साथ कारपोरेट पूंजी परस्त है तथा खुलेआम संघाीय ढांचे के विरूद्ध है, संसद द्वारा सर्वसम्मत अनुमोदन ने राजनीतिक प्रणाली तथा प्रक्रियाओं के बारे में बेहद बेचैन करने वाले प्रश्न खड़े कर दिए है।

      जो लोग भी जनतंत्रीकरण की प्रक्रिया तथा उसके सजीव संस्थागत रूप के बतौर संविधान के प्रति समर्पित है विशेषकर सम्प्रभू संसद के चुने प्रतिनिधि उन्हें इन सवालों पर अवश्य ही विचार करना चाहिए।

 

एस पी शुक्ला

पूर्व वित्त सचिव भारत सरकार

चेयरमैन राष्ट्रीय अभियान समिति (एनसीसी)