17-18 सितंबर 2022 को ग्वालियर बैठक के लिए विभिन्न विचार समूहों और राजनीतिक विश्वास के मित्रों के लिए एक नोट जिसका उद्देश्य एक कार्यक्रम आधारित एकता कायम करना जो सांप्रदायिक फासीवाद की चुनौतियों से निपट सके :-

 

 

        वर्तमान शासन अधिनायकवादी है, भारतीय संविधान का सम्मान नहीं करता है। सर्वोपरि नफरत से लेकर जन संहार के विचार का वाहक है जो भिन्न विश्वास, विचार और संस्कृति के लोगों पर आक्रामक है। इसने वैश्विक पूंजी, कारपोरेट घरानों खासकर कुछ परिवारों के साथ संश्रय कायम कर लिया है। मोटे तौर पर हम इसे वैश्विक पूंजी-हिंदुत्व गठजोड़ के बतौर चिन्हित कर सकते हैं। प्रायः लोग इसे पूंजी-सांप्रदायिक गठजोड़ भी कहते हैं। मेरी नजर में सांप्रदायिक की जगह हिंदुत्व का प्रयोग राजनीतिक दृष्टी से अधिक उपयुक्त है। हिंदुत्व अपने अंदर न केवल सांप्रदायिक बल्कि परिवर्तन विरोधी रूढ़िवादी विचार और वर्णीय श्रेष्ठता का मूल्य समेटे हुए है। कहने की जरूरत नहीं है कि हिंदुत्व का विचार सनातन हिंदू धर्म से अलग है। जहां हिंदू धर्म एक धार्मिक विश्वास है वहीं हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा है। सावरकर इस भिन्नता को तर्क के साथ मजबूत ढ़ंग से रेखांकित करते हैं। उनके लिए 'हिंदुत्व हिंदू धर्म' नहीं है।

           इस शासन के विरुद्ध तमाम राजनीतिक दल, नागरिक-सामाजिक आंदोलन, ढेर सारे कार्यकर्ता लगे हैं। कांग्रेस ने 7 सितंबर से 'भारत जोड़ो यात्रा' कन्याकुमारी से शुरू की है। विपक्ष के कुछेक दल अलग-अलग तरह की यात्राओं और कार्यक्रमों में लगे हैं। परिवर्तनकामी और वैकल्पिक राजनीति के लोग इसका स्वागत कर रहे हैं और इसमें शरीक भी हैं। आज की राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए ऐसा करना भी चाहिए। लेकिन यहीं इस तरह के कार्यक्रमों की सीमाओं को भी समझने की जरूरत है। इसलिए अपनी ठोस मांगों और स्थापनाओं को शरीक होने की इस प्रक्रिया में लोप भी नहीं होने देना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है कि विपक्ष के दल आज के दौर के प्रमुख अंतर्विरोध वैश्विक पूंजी और हिंदुत्व के गठजोड़ पर अमूमन चुप्पी साधे रहते हैं। यह अलग बात है कि कभी-कभार उन चुनिंदा कारपोरेट घरानों पर चोट करते हैं जिनके साथ मोदी सरकार ने गहरा तालमेल कर रखा है। वे मांगें जो सतह पर ठोस रूप में उभर कर आ गई हैं उस पर भी कोई ठोस विवरण और आश्वासन कांग्रेस समेत विपक्ष के दलों से नहीं मिलता है। जैसे आज के दौर का बड़ा संकट रोजगार और नौकरी के सवाल पर उभरता है। अग्निवीर भर्ती मामले में युवाओं के आक्रोश को देश ने अभी देखा ही है। जगह-जगह देश भर में इस तरह के विक्षोभ समय-समय पर युवाओं के उभरते रहते हैं। सामान्य आश्वासन के अलावा कोई ठोस पहल किसी विपक्षी दल की तरफ से नहीं दिखी। 

       देश में लगभग 27 करोड़ परिवार होने के आंकड़े हैं।  लोग यह चाहते हैं कि परिवार के एक सदस्य को नौकरी जरूर मिलनी चाहिए। आर्थिक प्रक्रिया जिसमें नौकरी दी जा सकती है को गंभीरता से जांचने और पड़ताल करने के पहले ही इस आधार पर खारिज कर देते हैं कि यह अव्यवहारिक मांग है जोकि संभव नहीं है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ लेकिन चीजों को प्रैक्सिस में जाने से यह लगता है इसे संभव बनाया जा सकता है। हमने एक अंकतालिका तैयार की है जो मेरे इस नोट के साथ संबद्ध है उसमें कुछ चीजें पूरी तौर पर स्पष्ट होती हैं। केंद्र और राज्यों के सभी क्षेत्रों को जोड़ दिया जाये तो लगभग साढ़े पांच करोड़ कर्मचारियों की संख्या हो जाती है। स्थानीय निकाय से लेकर कोआपरेटिव संस्थाओं, पब्लिक सेक्टर, सरकारी सहायता से संचालित संस्थाओं समेत राज्य व केंद्र सरकार के प्रतिष्ठानों में जो इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूदा वक्त में है उसमें बिना किसी बदलाव के भी 50 फीसदी तक कर्मचारियों की बढ़ोत्तरी संभव है। इस तरह ढाई से तीन करोड़ नौकरी देना मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर में ही संभव है। इसके अलावा शिक्षा-स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के तीन प्रमुख सेक्टर हैं जिन्हें सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक जवाबदेही है। अगर नागरिकों को इन मूलभूत सुविधाओं की गारंटी की जाये तो ऐसी स्थिति में इन क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर में गुणात्मक बदलाव की जरूरत होगी। नागरिक सुविधाओं के मद्देनजर इसी तरह अन्य सेक्टर में भी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में 5 करोड़ से भी ज्यादा नियमित नौकरी देना संभव बनाया जा सकता है बशर्ते सरकार बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र को कारपोरेट्स की मुनाफाखोरी के लिए बंद करे। जहां तक इसके लिए संसाधनों की उपलब्धता का सवाल है, इसे कारपोरेट्स पर संपत्ति कर, स्टेट ड्यूटी और उत्तराधिकार कर आदि तरीकों से हासिल किया जा सकता है, जैसाकि सुझाव देश के तमाम नामचीन अर्थशास्त्रियों द्वारा भी दिया गया है। इस तरह सरकारी क्षेत्र में ही 12 करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी मिल सकती है। इसके अलावा एक प्रमुख क्षेत्र कृषि है जिसमें कृषि आधारित उद्योगों जैसे फूड प्रोसेसिंग, मार्केटिंग और अन्य कुटीर उद्योग आदि क्षेत्रों में उत्पादक ईकाईयों और सेवा क्षेत्र में कोआपरेटिव संस्थायें बनाने की सरकार पहल ले तो इससे करोड़ों रोजगार का सृजन संभव है। निजी संगठित क्षेत्र से लेकर कारोबार और कृषि तक तमाम क्षेत्रों में भी पहले से ही लोग लगे हैं। ऐसी स्थिति में अगर सरकारी क्षेत्र में 12 करोड़ से अधिक परिवारों को नौकरी की गारंटी की जा सके, इसके अलावा कई करोड़ रोजगार कोआपरेटिव ईकाइयों में मिल सकता है। एक बार अगर यह प्रक्रिया शुरू होगी तो रोजगार सृजन की तमाम संभावनाएं खुल जायेंगी और देश की श्रमशक्ति की खपत हो जायेगी।

        उद्योग, व्यापार, सेवा क्षेत्र में विदेशी-इजारेदार पूंजी अपना आधिपत्य स्थापित करके कृषि योग्य भूमि, वन, खनिज संपदा और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को हड़प लेने की विभिन्न योजनाओं पर अमल कर रही है। सरकारें इनके पक्ष में कानून बनाने में लगी हैं। अद्यतन प्रमाण केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि संबंधी तीन कानून हैं जिन्हें किसान आंदोलन की सभी धाराओं ने एकताबद्ध होकर विफल कर दिया और मोदी सरकार को इन तीनों कानूनों को वापस लेना पड़ा। किसान आंदोलन अभी भी जारी है। किसान आंदोलन ने अपनी पुरानी सैद्धांतिक सीमाओं का अतिक्रमण किया है और भाजपा हराओ अभियान में भी शरीक हुआ। इस किसान आंदोलन ने जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण और विद्युत संशोधन विधेयक 2022 को वापस लेने जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाया है और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के प्रश्न पर डटे हुए हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य महज आर्थिक मुद्दा नहीं है। यह मौजूदा राजनीतिक अर्थतंत्र के मुहावरे और दिशा को बदल देने की पूरी क्षमता रखता है। डब्ल्यूटीओ और विदेशी पूंजी के आधिपत्य को यह आंदोलन खुली चुनौती है और नागरिकों के अधिकारों के प्रति इसकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है। विपक्षी दल जहां उनकी सरकारें हैं विदेशी पूंजी-इजारेदार पूंजी के राजनीतिक अर्थशास्त्र को बदलने की बात तो दूर रही कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी नहीं कर रहे हैं। वनाधिकार कानून का बुरा हाल है और श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर पूंजी और प्रबंधन की नंगी तानाशाही चल रही है। देश के असंगठित क्षेत्र के करीब 93 फीसद कामगार 10 हजार रुपये से नीचे जीवन निर्वाह कर रहे हैं और उनके सेवा श्रम की अवधि 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे करने पर सरकारें तुली हैं। मजदूरों के उन्नतीस कानूनों को खत्म करके दमनकारी चार लेबर कोड बना दिए गए है। मजदूरों की वास्तविक आमदनी में कमी हुई है और बेतहाशा बढ़ी महंगाई ने उनकी कमर तोड़ दी है जबकि कोरोना जैसी महामारी और महंगाई ने पूंजी घरानों को मुनाफा कमाने के अवसर खोल दिए हैं। इस प्रकार आर्थिक असमानता देश में बढ़ी है। 

 

          सर्वोपरि पूरे देश को काले कानूनों ने पूरी तौर पर जकड़ दिया है। नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता फर्जी मुकदमों में बिना जमानत जेलों में यातनाएं झेल रहे हैं। कुछेक बुजुर्ग कार्यकर्ता की जेलों में ही मौत हो गई है। राजद्रोह, एनएसए, यूएपीए, एनआईए, पीएमएलए जैसे ढेर सारे काले कानूनों ने यहां के नागरिकों को जकड़ रखा है। फिर भी लोक सभा-2024 के चुनाव का ऐजेंडा कोई विपक्षी दल इसे बनाने की मन: स्थिति में नहीं दिखता है। कांग्रेस भी मौलिक रूप से भाजपा की आर्थिक नीतियों से भिन्न न होने की बात करती है (आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में देखें राहुल गांधी का इंटरव्यू)। राज्यों और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता की बात विपक्ष जरूर उठाता है लेकिन जीएसटी कानून पारित कराने में इन दलों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। ऐसी ढेर सारी देश-विदेश की नीतियां हैं जिसमें शासक वर्ग की एकता दिखती है। फिर भी हमारा मत है कि 2024 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को परास्त किया जाना चाहिए और उन सभी लोगों को न्यूनतम मुद्दों और कार्यक्रम के आधार पर एकताबद्ध होना चाहिए जिनसे एकताबद्ध हुआ जा सके। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज के बड़े हिस्से की सांस्कृतिक गुलामी के लिए काम करती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके अनुसांगठनिक संगठन अंतिम निष्कर्ष में जन संहार (Genocide) की विचारधारा में यकीन करते हैं। विभिन्न संस्कृतियों के क्षेत्र का अतिक्रमण इनका स्वभाव है। 

            दुर्भाग्य यह है कि समग्रता में इनके विरुद्ध लड़ने की कोई वैचारिक-राजनैतिक रणनीति विपक्ष के पास नहीं है। रोटी, समता और स्वतंत्रता की राजनीतिक व्यवस्था और उसके समन्वय पर आधारित सत्ता निर्मित करने की चुनौती को इस बैठक को स्वीकार करना चाहिए। संविधान के प्रस्तावना में दिये गए न्याय को हमें अपना लक्ष्य (Moto) घोषित करना चाहिए। भाजपा हराने के अपने तात्कालिक कार्यभार को अपने इस सामाजिक परिवर्तन के कार्यभार के साथ जोड़ने की जरूरत है। यह महज सैद्धांतिक सूत्रीकरण नहीं बल्कि एक राजनीतिक जरूरत है। पुराने प्रयोगों और नारों को दोहराने से वित्तीय पूंजी समर्थित हिंदुत्व की ताकतों को शिकस्त नहीं दिया जा सकता। इसलिए उपरोक्त मुद्दों पर जनता को विश्वास में लेने की जरूरत है और नव उपनिवेशवाद से टकराने वाला राजनीतिक अर्थशास्त्र भी विकसित करना होगा। इन मुद्दों को महज आर्थिक मुद्दों के रूप में लेने से आप नये नरेटिव को निर्मित नहीं कर पायेंगे और न ही जनता के अंदर नया उत्साह और राष्ट्रीय भाव ही पैदा कर पायेंगे। हमें यह याद रखना होगा कि हिंदुत्व एक पुरानी राजनीतिक प्रवृत्ति है और उसकी जड़ें हमारे सामंती समाज में मौजूद हैं। इधर इसे फलने फूलने का अच्छा मौका वित्तीय पूंजी के सक्रिय सहयोग से मिला है और यह भी नोट करने लायक है कि नेहरू की आधुनिकता, सामाजिक न्याय की सीमाबद्धता और मार्क्सवाद की भारतीय समाज की यांत्रिक समझ के बरखिलाफ यह उभरी है और यह न केवल राजनीति में बल्कि सामाजिक और संस्कृति के क्षेत्र में भी नये प्रयोगों में लगी हुई है और यह बड़ी कुशलता से हमारे साहित्यिक-सांस्कृतिक महाकाव्यों और ग्रंथों को आधुनिक राजनीतिक शास्त्र में बदल रही है, इसलिए चुनाव में परास्त करने के कार्यभार पर कतई शिथिल न होते हुए भी चौतरफा इसके मुकाबले की तैयारी करनी होगी। मुजफ्फरनगर में हुए वीभत्स संहार का अनुभव यह सीख देता है कि विपक्ष की सरकारें बनना जरूरी है लेकिन पर्याप्त नहीं है। भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में हराने के लिए जनता के ज्वलंत मुद्दों पर आवाज उठाना और बदलाव का माहौल बनाना बेहद जरूरी है।

 

अखिलेंद्र प्रताप सिंह

 

 

 

 

 

केंद्र व राज्यों में सरकारी, सार्वजनिक व कोआपरेटिव सेक्टर में कर्मचारियों की संख्या, बैकलॉग और वेतन-पेंशन में खर्च एवं बजट आदि का विवरण इस प्रकार है-

 

देश में कुल परिवारों की संख्या            27 करोड़

 

केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या                32 लाख

सेना                                                   14 लाख

21 सरकारी बैंक में कुल  कर्मचारी          8 लाख                             

केंद्रीय पब्लिक सेक्टर यूनिट                11 लाख

बीमा सेक्टर                                        1.80 लाख

कुल कर्मचारियों की संख्या                   66.8 लाख 

 

केंद्र सरकार के प्रतिष्ठानों में संविदा कर्मचारियों की संख्या                   24.5 लाख

(सभी सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़े)

 

 

स्कीम वर्कर्स

आंगनबाड़ी व सहायिका                      25 लाख

मिड डे मील                                      25 लाख

आशा कार्यकत्री                                  11 लाख

शिक्षा मित्र व अनुदेशक                      15 लाख(अनुमानित)

पंचायत मित्र/रोजगार सेवक                 2.5 लाख अनुमानित

कुल संख्या                                        78.5 लाख 

 

 

राज्यवार कर्मचारियों की संख्या 

 

उत्तर प्रदेश 16 लाख,   महाराष्ट्र 19 लाख,   गुजरात 9.38 लाख,   हरियाणा 2.85 लाख,   पंजाब 2.85 लाख,  बिहार 4.5 लाख,   झारखंड 2.0 लाख, छत्तीसगढ़ 5 लाख,   पं. बंगाल 10 लाख, उड़ीसा 3.5 लाख,  मध्यप्रदेश 4.5 लाख,  तेलंगाना 3.0 लाख, तमिलनाडु 9 लाख, राजस्थान 7 लाख, उत्तराखंड 1.1 लाख,  हिमाचल प्रदेश 1.82 लाख, केरल 13 लाख (सरकारों द्वारा प्रस्तुत आंकड़े) 

 

17 प्रमुख राज्यों में कुल कार्यरत कर्मचारियों की संख्या :       110.35 लाख (1.10 करोड़। 

 

शेष बचे राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में अनुमानित संख्या 30 लाख 

 

राज्यों में कुल कार्यरत सरकारी कर्मचारियों की संख्या   1.40 करोड़(अनुमानित) 

 

उत्तर प्रदेश में 103 सार्वजनिक उपक्रमों और कम्पनी में कार्यरत कर्मचारी 112784  ( सरकार द्वारा प्रस्तुत)।  इसके आधार पर सभी राज्यों को मिलाकर सार्वजनिक उपक्रमों में कर्मचारियों की अनुमानित संख्या 15 लाख 

 

 

उत्तर प्रदेश में संविदा/आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की अनुमानित संख्या 10 लाख , बिहार में संविदा कर्मियों की संख्या 8 लाख है, राजस्थान में संविदा कर्मियों की संख्या तकरीबन 3 लाख, मध्य प्रदेश पावर सेक्टर आउटसोर्सिंग वर्कर्स की संख्या 45 हजार, झारखंड में संविदा/आउटसोर्सिंग 2.5 लाख, छत्तीसगढ़ में संविदा/आउटसोर्सिंग 1.0 लाख

 

इसके आधार पर सभी राज्यों में संविदा/आउटसोर्सिंग कर्मियों की अनुमानित संख्या  100 लाख (1 करोड़)

 

सहकारी समितियां 

अमूल में कर्मचारियों की संख्या 17000। राजस्थान में 16000 । मध्यप्रदेश में सहकारी समितियों में 55000 कर्मचारी हैं। उत्तर प्रदेश के प्राथमिक कृषि ॠण सहकारी समिति में 35000 कर्मचारी हैं। केरल में सहकारी समितियों में 60000 कर्मचारी हैं। छत्तीसगढ़ में 15000 कर्मचारी। इन आंकड़ों एवं अध्ययन के आधार पर देश भर में कुल सहकारी कर्मचारियों की अनुमानित संख्या    20 लाख ।

 

सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र में कुल कर्मचारियों (पर्मानेंट व कैजुअल) 444.80 लाख (4.45 करोड़) 

 

बैकलॉग (स्वीकृत पदों के सापेक्ष रिक्त पद) 

 

केंद्रीय कर्मचारी -  10 लाख।   सेना-  1.25 लाख।  बैंकिंग सेक्टर -  0.41 लाख । इसके अलावा राज्यों में स्वीकृत पदों के सापेक्ष अनुमानित आंकड़ा 30 फीसद बैकलॉग के आधार पर  60 लाख रिक्त पद। पब्लिक सेक्टर(केंद्र व राज्य) व सहकारी समितियों में बैकलॉग 10 लाख (अनुमानित)

स्कीम वर्कर्स आदि में बैकलॉग 10 लाख (अनुमानित)

 

केंद्र व राज्यों में कुल बैकलॉग   91.66 लाख अनुमानित 

(नोट: संविदा/आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के भी तय मानक से काफी कम संख्या कार्यरत है जो इसमें शामिल नहीं है ) 

सरकारी, सार्वजनिक व कोआपरेटिव सेक्टर में कुछ कार्यरत कर्मचारी व बैकलॉग पद मिलाकर  536.46 लाख (5.36 करोड़) । 

 

केन्द्र सरकार का बजट 39.44 लाख करोड़, केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन पर खर्च  3.23 लाख करोड़, पेंशन 2.77 लाख करोड़। इसके अलावा कुछेक राज्यों का बजट एवं कर्मचारियों के वेतन व पेंशन मद में खर्च इस प्रकार है।  यूपी का बजट 6.15 लाख करोड़, वित्तीय वर्ष 2022-23 में 153569.63 करोड़ वेतन  और 77077.75 करोड़ रुपये पेंशन पर खर्च। महाराष्ट्र का बजट 5.49 लाख करोड़, 1.32 लाख करोड़ वेतन पर खर्च।  बिहार का बजट 2.38 लाख करोड़, 22 फीसदी वेतन व पेंशन पर खर्च। मध्य प्रदेश का बजट 2.5 लाख करोड़, 24 फीसद वेतन व पेंशन पर खर्च। कर्नाटक का बजट 2.66 लाख करोड़।  झारखंड का बजट 1.01 लाख करोड़। हरियाणा का बजट 1.77 लाख करोड़। 

केंद्र व राज्यों को मिलाकर अनुमानित बजट 100 लाख करोड़ (नोट: इसमें पब्लिक सेक्टर, कोआपरेटिव और स्वायत्त शासी संस्थाओं का बजट शामिल नहीं है, इन ईकाईयों का इससे अलग बजट है) 

केंद्र व राज्यों के सभी नियमित कर्मचारियों के वेतन व पेंशन पर खर्च 25 लाख करोड़ (अनुमानित) 

संविदा/स्कीम वर्कर्स में कुल खर्च 4 लाख करोड़

साढ़े चार करोड़ कर्मचारियों (नियमित व संविदा) पर कुल बजट 29 लाख करोड़

                     27 करोड़ परिवारों में 55 साल उम्र से ज्यादा की परिवारिक ईकाईयों की संख्या तकरीबन 5 करोड़ इसमें करीब डेढ़ करोड़ सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त शामिल हैं। इस तरह वास्तविक परिवारों की संख्या 22 करोड़ है. इसमें अगर सरकारी, सार्वजनिक व कोआपरेटिव ईकाईयों में 6 कऱोड  नौकरी की सरकार गारंटी कर दे, 5.5 करोड़ कर्मचारी सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र में पहले से हैं। इसके अलावा  करीब 10 करोड़ शेष बचे परिवारों के एक सदस्य को रोजगार/नौकरी आसानी से खेती, व्यापार से लेकर निजी क्षेत्र (संगठित) में मिल सकती है। इस तरह इन 6 करोड़ लोगों के लिए 50 हजार रुपए सैलरी की दर से 36 लाख करोड़ बजट आयेगा। अगर सरकार द्वारा कारपोरेट पर संपत्ति कर, स्टेट ड्यूटी और उत्तराधिकार कर आदि लगाया जाये और शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्र में नागरिक सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाये, कृषि आधारित उद्योग-धंधों व कुटीर उद्योगों और सेवा क्षेत्र में कोआपरेटिव ईकाइयों के माध्यम से इन्हें मजबूत बनाने पर जोर दिया जाये तो एक बार इस प्रक्रिया के शुरू होने पर हर परिवार के एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी की गारंटी की जा सकती है।

 

 

 

 

 

 

17 -18 सितम्बर 2022 की बैठक में बातचीत के लिए निम्न एजेंडा हो सकता है

 

1.         रोजगार को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए। हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए। सरकारी विभागों में रिक्त पदों को तत्काल भरा जाए। विभिन्न उद्योगों व सरकारी विभागों में कार्य कर रहे ठेका/संविदा श्रमिकों व स्कीम वर्कर्स को नियमित किया जाए व उनके सम्मानजनक वेतन की गारंटी की जाए। मनरेगा को शहरी क्षेत्र में भी लागू किया जाए और पूरे देश में न्यूनतम 200 दिन रोजगार की हर हाल में गारंटी की जाए। मजदूर विरोधी चार लेबर कोड वापस लिए जाए। सरकारी कर्मचारियों की 2005 के पूर्व की पुरानी पेंशन स्कीम बहाल की जाए।

2.         महंगाई से निपटने के लिए मूल्यों में समता (Parity of price) लाई जाए और दाम नीति घोषित की जाए।

3.         देश की असमानता को समाप्त करने और राष्ट्रीय संसाधनों और आम जनता की आमदनी को बढ़ाने के लिए कारपोरेट घरानों पर सम्पत्ति कर, स्टेट ड्यूटी, उत्तराधिकार कर जैसे करों को लगाया जाए। जनकल्याण पर रोक लगाने वाले राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन कानून (एफआरबीएम) 2003 को समाप्त किया जाए।

4.         हर हाल में असहमति के अधिकार की रक्षा हो और एएफएसपीए, यूएपीए, राजद्रोह, रासुका, मोकोका, यूपीकोका तथा छत्तीसगढ़ विशेष सुरक्षा विधेयक 2005 जैसे काले कानूनों को समाप्त किया जाए। मानवाधिकारों और हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई की जाए।

5.         चुनावी बांड व्यवस्था सहित हाल के समय में चुनावी चंदे से जुड़े कानूनों में किए गए तमाम प्रतिगामी बदलावों को समाप्त करने, चुनावों की फंडिंग के लिए एक नेशनल इलेक्शन फंड की स्थापना करने और धन के उपयोग के लिए एक व्यापक कानून बनाने एवं कम्पनियों से प्राप्त चन्दा की जानकारी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम तथा उसे जुड़े नियमों के  तहत सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाए।

6.         ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट‘ (जो सबसे आगे वही जीता) की मौजूदा व्यवस्था के साथ ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था भी हो यानी पार्टी को मिले मत के आधार पर भी संसद और विधानसभाओं में सीटों का आवंटन किया जाए।

7.         कृषि और लघु, मझोले उद्योग में सहकारी प्रबंधन और पर्याप्त संसाधन मुहैया कराया जाए। किसानों को तत्काल राहत देने के लिए कृषि लागत मूल्य आयोग को वैधानिक दर्जा, सम्पूर्ण कर्जा मुक्ति और फसल की खरीद व सी-2 के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए राष्ट्रीय कानून बनाया जाए। लाभकारी सार्वजनिक ईकाइयों के निजीकरण/विनिवेशीकरण पर रोक लगाई जाए। विद्युत संशोधन विधेयक 2022 वापस लिया जाए।

8.         सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के माध्यम से सबको कम कीमत पर दवा और उपचार मुहैया हो, चिकित्सा सेवाएं लोगों को आसानी से उपलब्ध हों। चिकित्सा, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के अन्य मदों में पर्याप्त बजट का आवंटन किया जाए। 

9.         सरकारी स्कूल प्रणाली को मजबूत किया जाए और उसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी की जाए और सरकारी स्कूलों में अध्यापकों के खाली पड़े पदों को तत्काल भरा जाए। उच्च शिक्षा की स्वायत्ता बहाल की जाए, शोध कार्य में बजट कटौती पर रोक लगायी जाए और उसे मजबूत बनाया जाए। ग्रामीण गरीब परिवारों, विशेषकर जनजातियों और आदिवासियों के बच्चों की शिक्षा को सुनिश्चित करने और बढ़ावा देने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएँ। दलितों और आदिवासियों विशेषकर महिलाओं की उच्च शिक्षा के लिए सरकार द्वारा भोजन, आवास और अन्य खर्चों की व्यवस्था की जाए।

10.       चौतरफा पर्यावरण का विनाश हो रहा है और पूंजी संचय के लिए पर्यावरण को नष्ट किया जा रहा है। जिसमें देशी विदेशी पूंजी सब लगी हुई है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र तथा शक्ति सम्पन्न पर्यावरण आयोग बनाया जाए। लधु खनिज के खनन को खनिज निगमों के माध्यम से कराकर जनता को सस्ती खनन सामग्री उपलब्ध करायी जाए। प्राकृतिक संसाधनों की निजी लूट पर रोक लगाई जाए।

11.       महिलाओं की सुरक्षा के लिए हर विभाग में महिला सेल का गठन किया जाए और महिला कोर्ट की स्थापना हो। महिलाओं को संसद व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल पास किया जाए।

12.       वनाधिकार कानून-2006 को कड़ाई से लागू किया जाए और बड़े पैमाने पर इस कानून के तहत आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों को पुश्तैनी वन भूमि, खनिज पदार्थ और वन उत्पाद पर अधिकार की मान्यता प्रदान किया जाए। भूमि सुधार लागू किया जाए और ग्राम पंचायत की ऊसर, परती, मठ व ट्रस्ट की जमीन का भूमिहीन गरीबों में वितरण किया जाए। पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) कानून (पेसा कानून) को मजबूती से लागू किया जाए।

13.       अति पिछड़ों के आरक्षण कोटे को अन्य पिछड़ा वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे से अलग किया जाए। धारा 341 में संशोधन कर दलित मुस्लिमों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाए।

14.       माब लिंचिंग के विरूद्ध कानून बनाया जाए और ऐसी घटनाएं होने पर सम्बंधित डीएम और एसपी को जवाबदेह बनाते हुए उनके विरूद्ध कार्यवाही की जाए।

15.       भेदभाव-निवारण के लिए एक व्यापक कानून बनाया जाए और इस पर नजर रखने के लिए समान अवसर आयोग गठित किया जाए। अनुसूचित जाति व जनजाति सबप्लान और स्पेशल कम्पोनेंट प्लान को वैधानिक दर्जा दिया जाए।

16.       भ्रष्टाचार निरोधी संस्थानों को हुए नुकसान की भरपायी के लिए इनकी स्वायत्ता सुनिश्चित की जाए और भ्रष्टाचार-निवारक अधिनियम में हुए प्रतिगामी संशोधनों को समाप्त किया जाए। पारदर्शी तरीके से लोकपाल की नियुक्ति की जाए और लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री कार्यालय व कारपोरेट घरानों को भी लाया जाए।

17.       स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण के जरिए मीडिया की आजादी, विविधता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

18.       न्यायिक सुधार किया जाए। न्यायिक आयोग द्वारा जजों की नियुक्ति की जाए और सस्ती व शीघ्र न्याय देने वाली न्यायिक व्यवस्था ग्राम पंचायत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक हो। सेवानिवृत्ति के बाद कम से कम तीन साल तक सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला कोर्ट के जजों की नियुक्ति कहीं न हो।

19.       प्रकाश सिंह केस में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार पुलिस सुधार किया जाए।

20.       पड़ोस के मुल्कों के साथ सीमा विवाद को आपसी बातचीत और कूटनीतिक तरीके से हल किया जाए। युद्धोन्माद का विरोध किया जाए।