मायावती ने भी की आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत
-एस.आर. दारापुरी राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट   
बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान मायावती ने एक बार फिर सवर्ण तबके के गरीब लोगों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत की है. इस से पहले जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थीं तो उन्होंने गरीब सवर्णों के  लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने की घोषणा की थी. यद्यपि मायावती की यह घोषणा सर्वजन के फार्मूले के अंतर्गत सवर्ण वोटों को आकर्षित करने का प्रयास है परन्तु इस से भाजपा व् अन्य आरक्षण विरोधियों द्वारा आरक्षण के आधार को जाति के स्थान पर आर्थिक किये जाने की मांग को बल मिलता है. 
यह सर्वविदित है कि हमारे संविधान में आरक्षण का आधार सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन और सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है. यह आरक्षण इन क्षेत्रों में पिछड़े समूहों जिन में दलित व् पिछड़ी जातियां शामिल हैं को दिया गया है. इस में कहीं भी आर्थिक आधार की बात नहीं कही गयी है. इसी लिए जब जब किसी भी पार्टी की केन्द्रीय सरकार या प्रांतीय सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रयास किया है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाता रहा है. हाल में राजस्थान में भाजपा की सरकार ने आर्थिक आधार पर 14% आरक्षण देने की घोषणा तो कर दी है परन्तु इसका हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाना निश्चित है.
लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ समय समय पर सवर्ण गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दे कर वोट लेने  की कोशिश करती रही हैं या वादा करती रही हैं जबकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ऐसा करना बिलकुल संभव नहीं है. फिर भी राजनैतिक पार्टिया आम लोगों को इस प्रकार का झांसा देती रहती हैं. आरक्षण के बारे में एक बात स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन प्रोग्राम नहीं है. यह तो सदियों से हिंदुयों की सामाजिक व्यवस्था द्वारा वंचित किये गए तबकों की प्रशासनिक एवं राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व देने का प्रयास मात्र है. हाँ यह बात सही है कि सवर्ण जातियों में भी गरीब लोग हैं. क्योंकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संभव नहीं है अतः उन्हें छात्रवृति तथा सस्ता क़र्ज़ आदि देकर आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए. 
दरअसल वर्तमान में आरक्षण विरोध का मुख्य कारण सवर्ण तबकों में बढ़ती हुयी बेरोज़गारी है. यह सर्विदित है कि सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण सरकारी क्षेत्र में नौकरियां बराबर कम हो रही हैं और सरकार अपना खर्चा कम करने के लिए नयी नौकरियां नहीं दे रही है. केंद्र में वर्तमान भाजपा सरकार ने अपना खर्चा घटाने के इरादे से एक साल तक कोई भी भर्ती न करने की घोषणा की है. 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करते समय निजीकरण तथा भूमंडलीकरण के माध्यम से रोज़गार के अवसरों के असीमित बढ़ने के सपने दिखाए गए थे परन्तु परिणाम बिलकुल उल्टा निकला है. रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी के स्थान पर कमी हुयी है. भाजपा की वर्तमान सरकार ने भी चुनाव में हर बेरोजगार को काम देने का वादा किया था परन्तु अभी तक इस दिशा में कोई भी उपलब्धि दिखाई नहीं दी है. दूसरी तरफ निजी क्षेत्र जिसे मोदी हर तरह की सुविधा/छूट दे रहे हैं, लाभ कमा  कर मालामाल हो रहा है परन्तु सरकार उन पर रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए कोई भी दबाव नहीं डाल रही है. 
अतः यह वांछनीय है कि सभी राजनैतिक पार्टियां बेरोजगार युवाओं को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा कर बरगलाने की जगह वर्तमान सरकार पर निजी क्षेत्र में रोज़गार के अवसर पैदा करने का दबाव डालें. इस का सब से कारगर हल तो रोज़गार को मौलिक अधिकार घोषित करने के लिए व्यापक जनांदोलन ही है. यदि रोज़गार मौलिक अधिकार बन जाता है तो फिर सरकार को अपनी कार्पोरेट परस्त नीतियाँ बदलनी पड़ेंगी. फिर सरकार या तो सभी बेरोजगारों को रोज़गार देगी या फिर सब को बेरोज़गारी भत्ता देगी. ऐसा हो जाने पर चाहे वह भागवत हों या मायावती हो, को युवाओं को आरक्षण का झुनझुना दिखा कर बरगलाने का मौका नहीं मिलेगा. रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग को लेकर गत वर्ष आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय संयोजक, अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने जंतर मंतर पर 10 दिन का अनशन किया था. इसी मुद्दे को लेकर “उत्तर प्रदेश बचाओ अभियान” के अंतर्गत 28 अक्तूबर को “युवा संकल्प सभा” का लखनऊ में आयोजन किया गया है.