रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान का प्रस्तावित एजेण्डा
रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान का प्रस्तावित एजेण्डा
वर्तमान अधिनायकवादी शासन के विरुद्ध एक सकारात्मक कार्यक्रम :- संयुक्त कार्रवाई के लिए एक व्यापक मोर्चा बनाने की दिशा में
रोजगार और सामाजिक अधिकारों की बहाली के लिए अभियान निर्माण के नीति बिंदु -
भारत सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तरों पर गहरे संकटों का सामना कर रहा है। सामाजिक विभाजन, चुनावों में व्यापक हेरफेर, और चुनावों से पहले बड़े पैमाने पर रिश्वत-जैसे मुफ्त वितरण का उपयोग सत्ता में बने रहने के साधन के रूप में किया जा रहा है। विपक्ष इतना संगठित नहीं है कि वह शासक वर्ग को चुनौती दे सके। जहाँ भी विपक्ष एकजुट हुआ है, उसने अंतर पैदा किया है-जैसे 2024 के लोकसभा चुनावों में। लेकिन उसके बाद, विधानसभा चुनावों में वह लगातार चुनौती खड़ी नहीं कर पाया है।
चुनौती पेश करने की विपक्ष की अक्षमता से सत्ताधारी पार्टी और अधिक आक्रामक हो गई है और वह लेबर कोड लागू करने तथा किसानों की पूर्ण लागत पर एमएसपी की मांगों को अनदेखा करने जैसे जन-विरोधी कदम उठा रही है। युवा रोजगार की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार असंगठित क्षेत्र को मदद देने जोकि व्याप्क रोजगार देने में सक्षम है, के बजाय क्रोनी पूंजीवाद को बढ़ावा देने में अधिक रुचि रखती है। पूंजी-गहन क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा और ग्रामीण विकास जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों पर वास्तविक अर्थों में खर्च घटाया जा रहा है।
बड़े व्यवसायों को दी जा रही रियायतों के कारण असमानताएँ बढ़ रही हैं और बजट में असंगठित क्षेत्र, मजदूरों, किसानों, युवाओं और महिलाओं की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचते। सरकार का बहाना है कि संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। यह स्पष्ट रूप से गलत है। संसाधन बड़े व्यवसायों को दी गई रियायतों और बढ़ती काली अर्थव्यवस्था के कारण केंद्रित हो रहे हैं।
भारत अपने विकास के लिए संसाधनों की कमी से ग्रस्त नहीं है। कमी केवल अमीर तबकों की उपभोक्तावादी जीवनशैली को बनाए रखने के लिए है, जो यूरोप जैसी विलासिता चाहते हैं।
कार्यक्रम का आर्थिक पक्ष
संसाधन जुटाना -
1- देश के अति-धनाढ्य वर्ग, विशेषकर खरबपतियों और अति-उच्च संपत्ति वाले व्यक्तियों पर प्रभावी संपत्ति कर लगाया जाना चाहिए। इस कर से प्राप्त संसाधनों से प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और सम्मानजनक पेंशन का कानूनी अधिकार सुनिश्चित किया जा सकेगा। उचित संरचना से काली आय पर भी नियंत्रण होगा और संसाधन दोहरे रूप से बढ़ेंगे।
2- जीएसटी व्यवस्था में सुधार कर उसे केवल अंतिम बिंदु पर वसूला जाना चाहिए। इसे केवल विलासिता के अंतिम उपभोक्ता वस्तुओं पर लगाया जाए और आवश्यक वस्तुओं को जीएसटी से मुक्त किया जाए। इससे महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिलेगी।
3- राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM), 2003 को रद्द किया जाना चाहिए ताकि हाशिए के वर्गों और आवश्यक सामाजिक सेवाओं के लिए वित्तीय बाधा न बने।
4- पूंजी और संसाधनों का नियोजन होना चाहिए। उचित नियोजन से कल्याणकारी योजनाएँ लागू होंगी और बेरोजगारी व महंगाई पर नियंत्रण होगा। कृषि, हस्तशिल्प, कुटीर उद्योग और सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को मजबूत किया जाना चाहिए।
5- राष्ट्रीय संप्रभुता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा तथा सरकारी योजना को प्रभावी बनाने के लिए पूंजी प्रवाह को केंद्र सरकार द्वारा विनियमित किया जाना आवश्यक है।
6- संपत्ति कर से पूंजी के बाहर जाने की आशंका जताई जाती है। इसे रोकने के लिए पूंजी खाता नियंत्रण लागू किया जाना चाहिए। वित्तीय पूंजी बाहर जा सकती है, पर भौतिक पूंजी देश में रहेगी। इससे मुद्रा मूल्य और ब्याज भुगतान पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन पूंजी पलायन कम होने से उसका संतुलन संभव है।
वित्त
7- क्षेत्रीय असंतुलन को दूर किया जाना चाहिए। पिछड़े क्षेत्रों से पूंजी का विकसित राज्यों में पलायन रोका जाना चाहिए। स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होने से मजबूरन होने वाला मजदूरों का पलायन भी रुकेगा।
8- माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक साहूकारी और व्यापक शोषण के केंद्र बन चुकी हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की रिपोर्टें दिखाती हैं कि ये कंपनियाँ वार्षिक 30 प्रतिशत तक ब्याज वसूलती हैं। विरोध करने वालों को दमन का सामना करना पड़ता है।
9- महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित हैं क्योंकि इन कंपनियों ने महिलाओं के समूहों का उपयोग कर मनमानी ब्याज दरों से भारी मुनाफा कमाया है।
इन माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को विनियमित करने के लिए केंद्रीय कानून आवश्यक है। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सरकार 10 लाख रुपये तक के ऋण 4 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर दे तथा उनके उत्पादों के लिए बाजार और सरकारी खरीद सुनिश्चित करे।
10- गैर-बैंकिंग कंपनियों द्वारा की जा रही लूट को रोकने के लिए अवैध जमा योजनाओं पर प्रतिबंध अधिनियम 2019 का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। सहारा, पल्स, एचबीएन, लक्की और अन्य बड़ी धोखाधड़ी करने वाली कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, उनकी संपत्ति जब्त की जाए और जनता का पैसा सरकार द्वारा वापस किया जाए।
किसान
11- किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार, सहकारिताओं को मजबूत करना, सरकारी खरीद, उर्वरक, बीज, कीटनाशक आदि की सस्ती उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। डेयरी, मत्स्य पालन, भेड़ पालन और पशुपालन जैसे पारंपरिक आजीविकाओं को बढ़ावा दिया जाए।
12- किसानों और मजदूरों के गठबंधन का निर्माण किया जाए।
रोजगार और मजदूर
13- तकनीकी प्रगति को देखते हुए रोजगार बढ़ाने के लिए कम कार्य सप्ताह पर विचार किया जा सकता है।
14- मनरेगा का बजट बढ़ाया जाए और शहरी क्षेत्रों के लिए भी इसी तरह की रोजगार गारंटी योजना बनाई जाए।
15- चारों श्रम संहिताएँ, जो मजदूर-विरोधी हैं, को रद्द किया जाए।
16- मजदूरों को सम्मानजनक वेतन मिले और ठेका/आउटसोर्स कर्मचारियों व कुलियों को स्थायी नौकरी दी जाए। आंगनबाड़ी, आशा, रसोइया, शिक्षामित्र, पंचायत मित्र जैसे स्कीम वर्कर्स को सरकारी कर्मचारी का दर्जा।
17- गिग वर्करों के सामाजिक सुरक्षा के लिए केंद्रीय कानून आवश्यक है।
18- सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बहाल की जाए।
संप्रभुता
19- बिजली, बैंकिंग, बीमा, रेलवे, रक्षा, बंदरगाह, कोयला, गैस और पेट्रोलियम जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के निजीकरण को रोककर नागरिकों और राष्ट्र की आर्थिक संप्रभुता की रक्षा की जाए।
20- अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के सामने संप्रभुता के क्षरण को उलटने के लिए कदम उठाए जाएँ।
सामाजिक क्षेत्र
21- सार्वजनिक शिक्षा के लिए बजट बढ़ाकर जीडीपी का 6 प्रतिशत तक पहुँचाया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर जीडीपी का 3 प्रतिशत किया जाए। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त कर्मचारी, दवाएँ और परीक्षण सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएँ।
22- आईटीआई और कौशल विकास केंद्रों का विस्तार हो और प्रशिक्षण को ओद्योगिक जरूरतों से जोड़ा जाए।
23- आर्थिक मजबूती और रणनीतिक सुरक्षा के लिए अनुसंधान और तकनीक के बजट को बढ़ाया जाए।
24- सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में लगभग खाली एक करोड़ पदों को भरा जाए और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक रोजगार की गारंटी दी जाए।
सामाजिक न्याय
25- खाद्य, रोजगार, आवास, शिक्षा आदि के अधिकारों को पूर्ण रूप से लागू किया जाए।
26- बेरोजगारी भत्ता लागू किया जाए।
27- अति पिछड़ी जातियों के लिए ओबीसी आरक्षण के भीतर अलग कोटा बनाने वाली जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। ओबीसी आरक्षण को वर्गीकृत कर अति पिछड़े वर्ग के लिए स्पष्ट हिस्सा निर्धारित किया जाए।
कर्पूरी ठाकुर फार्मूले की भावना के अनुरूप, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अति पिछड़ी जातियों, पसमान्दा मुसलमानों और महिलाओं का संसाधनों में अधिकार और सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
एससी-एसटी उप-योजना का बजट बढ़ाया जाए। निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू किया जाए। अति पिछड़ों के लिए भी एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम जैसा कानून बनाया जाए। राष्ट्रीय जनगणना में 1961 से पूर्व की तरह आदिवासी धर्म का अलग कॉलम जोड़ा जाए।
28- इंटरनेट को एक निःशुल्क सार्वजनिक साधन बनाया जाए।
सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी पहलू
29- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन कर चुनावों में अनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू किया जाए।
30- चुनावी प्रक्रियाओं को हर परिस्थिति में निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया जाए।
31- चुनावी अनियमितताओं पर कठोर कार्रवाई हो। राजनीतिक दलों के लिए चुनावी व्यय की सीमा लागू हो। राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिक ढंग से काम करने के लिए सुधार आवश्यक हैं।
32- यूएपीए और राजद्रोह जैसे दमनकारी कानूनों को समाप्त किया जाए। लोकतांत्रिक अधिकारों की हर कीमत पर रक्षा की जाए और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग को रोका जाए।
33- 1961 के पूर्व की तरह जनगणना में आदिवासी धर्म कोड को शामिल किया जाए, आदिवासी क्षेत्रों में पेसा कानून और वनाधिकार कानून का कड़ाई से पालन हो।
34- सभी नीतियाँ पर्यावरण के अनुकूल हों। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर किसानों और मजदूरों पर पड़ता है। इसके लिए उपभोक्तावाद और सामाजिक अपव्यय पर रोक लगाई जाए और सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत किया जाए।
35- सभी नीतियों में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल किया जाए।
36- राजनीति, व्यवसाय, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि सभी क्षेत्रों में जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। आरटीआई और व्हिसलब्लोवर कानून को मजबूत किया जाए।
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
संस्थापक सदस्य,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट।