राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति पर
राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति पर
भारत में लोकतंत्र पर खतरा वास्तविक और तत्काल है। इसलिए अब यह कहना सही नहीं होगा कि देश केवल “एक मोड़” पर खड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है कि नया अधिनायकवादी शासन वाम-उदारवादी राजनीति पर बढ़त हासिल कर चुका है। इसने केवल सत्ता पर कब्जा नहीं किया, बल्कि पूरे राजनीतिक क्षेत्र को पुनर्गठित कर दिया है।
जो कुछ हो रहा है वह लोकतंत्र की अस्थायी विकृति या विचलन नहीं है। केवल संवैधानिक संस्थाओं जिसमें चुनाव आयोग स्पष्ट उदाहरण है, का दुरुपयोग ही नहीं हुआ है - बल्कि यह एक ढांचागत परिवर्तन है, जो कॉर्पोरेट पूंजी, बहुसंख्यकवादी पहचान और बढ़ते केंद्रीकृत राज्य के गठजोड़ से संचालित हो रहा है।
इस सरकार में सरकारी परियोजनाएँ और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए गए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ने के दावे जारी हैं, जबकि बेरोजगारी बढ़ी है और युवाओं के अंदर भारी निराशा दिखती है। आईएमएफ, रिजर्व बैंक और स्वतंत्र संस्थाओं ने केंद्र सरकार द्वारा आँकड़ों में हेरफेर तथा महँगाई और बेरोजगारी को कम दिखाने की सच्चाई उजागर की है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं दिखती है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा महत्व के और आवश्यक क्षेत्रों का निजीकरण जारी है। लोगों के बीच में असमानता लगातार बढ़ रही है।
खेती की लागत बढ़ रही है, जबकि किसानों की आमदनी में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के सरकार के वादे अधूरे हैं। खेतिहर मजदूर और छोटे किसानों का संकट बढ़ता जा रहा है। किसान आत्महत्याएँ व्यापक रूप से जारी हैं। श्रम संहिताएँ श्रमिकों के अधिकारों पर एक बड़ा प्रहार हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा अब नीति का क्षेत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुकी है। दुनिया भर में हो रहे बदलाव के गलत आकलन से नुकसान हुआ है। मोदी सरकार उभरती बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था की जटिलताओं को समझने में विफल रही है। व्यापक रूप से कहा जाए तो सरकार ट्रंप प्रशासन पर निर्भर थी।
अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए शुल्कों ने भारतीय निर्यातकों - विशेष रूप से वस्त्र, दवा, ऑटोमोबाइल, इस्पात और अन्य क्षेत्रों - को भारी नुकसान पहुँचाया है। अमेरिका द्वारा सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीएसपी) वापस लेने से भारत की व्यापारिक बढ़त कम हुई है। हाल ही में पाकिस्तान के साथ झड़प की स्थिति में अमेरिकी प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण सुरक्षा मुद्दों पर भारत का समर्थन नहीं किया है।
भारत की पड़ोस नीति गहरे संकट में है - बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका और भूटान के साथ संबंध कमजोर हुए हैं। यहां तक कि भूटान ने भी भारत-पाक संघर्ष के दौरान भारत का समर्थन खुलकर नहीं किया। जबकि चीन ने दक्षिण एशिया में अपनी उपस्थिति मजबूत कर ली है।
केंद्र सरकार की कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिक्रिया साफ और सुसंगत नहीं रही है। तकनीक, खनिज संसाधन और पूँजी निर्माण के क्षेत्रों में भारत पिछड़ गया है। इसके बारे में सरकार न तो गंभीर प्रतीत होती है और न ही उसके पास विश्व की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने की कोई दीर्घकालिक दृष्टि है।
लोकतंत्र का संरचनात्मक संकट
विपक्ष बार-बार बढ़ते हुए अधिनायकवादी प्रवृत्ति को गलत ढंग से समझता रहा है। विपक्ष के लिए उभर रही अधिनायकवादी परिघटना महज वैचारिक है। इसमें कोई शक नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपना एक स्वतंत्र आधार है और यह भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसका सभी संवैधानिक संस्थाओं पर मोटे तौर पर कब्जा हो गया है। लेकिन आरएसएस के उभार को वैश्विक वित्तीय पूँजी के उदय की पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। दुनिया भर में भी भाजपा जैसी विभाजनकारी और नफरत पर आधारित राजनीति को वैश्विक वित्तीय पूँजी ही बढ़ावा देती है। सिर्फ चुनावी संघर्ष भाजपा से लड़ने के लिए अकेले पर्याप्त नहीं है। आरएसएस-भाजपा के उस मकसद को, जिसका उद्देश्य भारतीय समाज को ब्राह्मणवादी व्यवस्था और हिंदुत्व के ढाँचे में ढालना है, को परास्त करने के लिए हमें चैतरफा पहल लेनी चाहिए।
आज कॉर्पोरेट शक्ति केवल राज्य को प्रभावित नहीं करती - वह इसे संचालित करती है।
सार्वजनिक नीतियाँ, मीडिया ढाँचा, संसाधनों का वितरण और कल्याणकारी योजनाओं की कथाएँ राजनीतिक-कॉर्पोरेट गठबंधन के भीतर गढ़ी जाती हैं, जहाँ जवाबदेही समाप्त हो जाती है।
यह संरचना अपना वैचारिक आवरण खुद तैयार करती है - राष्ट्रवाद, ध्रुवीकरण और नेता-महिमा-जो बढ़ती बेरोजगारी, असमानता और अधिकारों के क्षरण को ढक देती है।
विपक्ष इसलिए कारगर नहीं हो पा रहा है क्योंकि वह अधिनायकवाद के वास्तविक भौतिक आधार का सामना नहीं करता -
- राजनीति में कॉर्पोरेट कब्जा
- मीडिया/शिक्षा का बाजारीकरण
- कल्याणकारी योजनाओं का संरक्षण-आधारित मॉडल में बदलना
- संस्थागत ढाँचे पर जबरन नियंत्रण
संरचनात्मक प्रश्नों से बचकर विपक्ष नारेबाजी, चुनावी गठबंधन और प्रतीकात्मक राजनीति में अक्सर उलझा रहता है, जो अधिनायकवादी ढाँचे को चुनौती नहीं देती।
उदार लोकतंत्र बिना सामाजिक, आर्थिक जनतांत्रिक आधार के नहीं टिक सकता। उदार लोकतंत्र को अदालतों, संसदीय विरोधों या नैतिक तर्कों भर से बचाया नहीं जा सकता और लोकतंत्र का संरक्षण केवल राजनीतिक दलों के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए जनता के सक्रिय प्रतिरोध की आवश्यकता है और उसको कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ की चुनौती के खिलाफ राजनीतिक रूप से संगठित करना होगा।
देश को एक बड़े राजनीतिक मंच की जरूरत है - लोकतांत्रिक राजनीतिक शक्तियों का एक व्यापक गठबंधन - जिसकी जड़ें हों -
- आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र में
- संवैधानिक नैतिकता में
अधिकारों और असहमति की रक्षा में
भेदभाव पर आधारित सामाजिक समूह - अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अति पिछड़ा वर्ग, पसमान्दा मुस्लिम, महिलाओं - का प्रतिनिधित्व और संसाधन हासिल करने का अधिकार। साथ ही यह समझ भी होनी चाहिए कि कारपोरेट राज्य को किस तरह से पुनर्गठित कर रहा है।
यह संयुक्त राजनीतिक मंच केवल अधिनायकवाद का विरोध नहीं करेगा - बल्कि भारत की एक नई लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रस्तुत करेगा - जो स्वतंत्रता को समानता, अधिकार को लोगों की आजीविका और लोकतंत्र का अनुभव प्रतिदिन जनता के जीवन में करेे। इस राजनीतिक मंच को समाज के विभिन्न वर्गों की आकांक्षाओं और दावों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।
भारत सिर्फ अधिनायकवादी शासन का सामना नहीं कर रहा - वह अपनी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन का सामना कर रहा है। अधिनायकवाद को तभी हराया जा सकता है - जब लोकतंत्र ठोस, सहभागी और जनता के जीवन-अनुभव में निहित हो।