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झारखंडी अस्मिता को लोकतांत्रिक दिशा देने का सवाल

झारखंडी अस्मिता को लोकतांत्रिक दिशा देने का सवाल

प्रस्तावना - झारखंड आंदोलन भारत के सबसे लंबे और महत्वपूर्ण जन आंदोलनों में से एक रहा है। यह केवल एक अलग राज्य की मांग का आंदोलन नहीं था बल्कि जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए चलाया गया व्यापक जनसंघर्ष था। झारखंड राज्य के गठन के बाद यह अपेक्षा की गई थी कि राज्य की राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक दिशा झारखंड आंदोलन की मूल आकांक्षाओं के अनुरूप विकसित होगी। लेकिन पिछले 25 वर्षों का अनुभव यह बताता है कि जनता की मूल आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई हैं।
           आज झारखंडी अस्मिता का प्रश्न सड़क से लेकर विधानसभा तक बहस में है। विधानसभा द्वारा पारित ‘1932 खतियान विधेयक जिसमें यह व्यवस्था है कि 1932 के भूमि अभिलेख या उससे पहले दर्ज व्यक्तियों/उनके पूर्वजों को स्थानीय व्यक्ति माना जाए तथा इसमें भूमिहीनों के लिए ग्रामसभा द्वारा पहचान का प्रावधान भी है, वह राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए अभी भी विचाराधीन है। जबकि कोई भी राष्ट्रपति लंबे समय तक किसी विधेयक को लंबित नहीं रख सकता। माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी इस आशय के निर्णय पारित किए हैं। भाजपा सरकार से संविधान-सम्मत व्यवहार की अपेक्षा नहीं की सकती है। यह कहना कि यदि कोई डोमीसाईल नीति बनती है तो वह नागरिकों के अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए हैं, उसका अतिक्रमण करेगा, सही नहीं है। जो विकासक्रम में ऐतिहासिक रूप से पिछड़ गए हैं उनके समुचित विकास के लिए ही संविधान में ही विशेष अवसर दिए गए हैं, जिसका लाभ सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समूह को मिलता है।
          इस प्रकार झारखंडी अस्मिता का प्रश्न एक राजनीतिक विवाद का विषय झारखंड में है। लेकिन यहां यह भी समझना जरूरी है कि झारखंडी अस्मिता की राजनीतिक दिशा क्या होगी? क्या वह केवल पहचान की राजनीति तक सीमित रहेगी या लोकतंत्र, सामाजिक अधिकारों, आर्थिक न्याय और जन भागीदारी के व्यापक कार्यक्रम का आधार बनेगी।

झारखंडी अस्मिता का ऐतिहासिक आधार -

झारखंडी अस्मिता का निर्माण लम्बे ऐतिहासिक संघर्षों के माध्यम से हुआ है। 30 जून 2026 के आज ही के दिन जब हम कार्यशाला में बैठे हैं, उसी तारीख में सिद्दू-कानू हूल दिवस झारखंड व भारत के अन्य आदिवासी क्षेत्रों में बहुत सम्मान के साथ मनाया जा रहा है। यह दिवस 1855 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और जमींदारों के शोषण के खिलाफ हुए ऐतिहासिक संथाल हूल आदिवासी क्रांति की याद दिलाता है। इसी तरह बिरसा मुंडा, तिलका मांझी समेत अनेक जननायकों ने भूमि, समुदाय व सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष किया। इन संघर्षों का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक पहचान की रक्षा नहीं था बल्कि शोषण और अन्याय के विरुद्ध जन अधिकारों की स्थापना भी था। झारखंड केवल एक भौगोलिक ईकाई नहीं बल्कि साझा इतिहास, साझा संघर्ष और साझी आकांक्षाओं से निर्मित सामाजिक राजनीतिक समुदाय है। इसमें आदिवासी, मूलवासी, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, किसान, मजदूर, खनिक, महिलाएं व युवा सभी शामिल हैं।

वर्तमान संकट -
         आज झारखंड अनेक संकटों का सामना कर रहा है। खनिज संपदा से समृद्ध होने के बावजूद राज्य की बड़ी आबादी गरीबी, बेरोजगारी और असुरक्षित जीवन का सामना कर रही है। इधर के वर्षों में कारपोरेट आधारित विकास माडल ने जल, जंगल और जमीन पर कारपोरेट नियंत्रण को मजबूत किया है। प्रमुख खनिज पदार्थों जिन्हें निजी कंपनियों को केंद्र सरकार देती है उनके लिए उनकी बिक्री दर का अमूमन एक-दो प्रतिशत रायल्टी तय करती है और बड़े सस्ते दर पर राज्य सरकारें खनिज पदार्थों को निजी कंपनियों को बेच देती हैं। खनिज पदार्थों के वसूले जाने वाले विभिन्न टैक्स केंद्र सरकार ले लेती है और राज्य के कोष में बहुत कम हिस्सा आता है। 5 वीं अनुसूची में दिए गए अधिकार का अनुपालन भी यहां न होने पर विवाद है।
        बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए राज्य से बाहर पलायन के लिए मजबूर हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का संकट लगातार गहरा रहा है। सार्वजनिक निवेश की कमी, पूंजी पलायन और निजीकरण की प्रवृत्ति ने गरीब तबकों के लिए बुनियादी सेवाओं तक पहुंच को कठिन बनाया है। महिलाओं पर आर्थिक बोझ बढ़ा है। माइक्रोफाइनेंस तथा नान बैंकिंग वित्तीय कंपनियों द्वारा विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी, मूलवासी महिलाओं का आर्थिक शोषण बडे़ स्तर पर दिखता है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सामाजिक विभाजन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी भी राज्य के सामने महत्वपूर्ण चुनौती है।
         इस प्रकार लोकतांत्रिक शक्तियों के लिए झारखंडी अस्मिता का अर्थ सांस्कृतिक लोकतंत्र के साथ खनिज संपदा, जल, जंगल और जमीन से उत्पन्न विकास का लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचे, विकास का उद्देश्य कारपोरेट मुनाफा नहीं बल्कि जनकल्याण होना चाहिए। इधर एक बड़ी मांग जनगणना में आदिवासी धर्म कोड कालम को जोड़ने की है। यह संविधान-सम्मत है इसे किया ही जाना चाहिए।
        आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और अन्य राजनीतिक दल जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान का गठन किया है, का झारखंड के बारे में मानना है कि झारखंडी अस्मिता की लोकतांत्रिक दिशा पहचान और जन अधिकारों को हासिल करने की है। यह 1932 खतियान, भूमि अधिकार, छोटा नागपुर टीनेंसी एक्ट 1908, संथाल परगना टीनेंसी एक्ट 1949 जैसे कानूनों की रक्षा, आदिवासी धर्म कोड की मान्यता, जल, जंगल और जमीन पर जनाधिकार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए अन्य सामाजिक अधिकारों को हासिल करने पर जोर देता है। रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान का यह भी मानना है कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पेंशन और भूमिहीनों को आवासीय जमीन का अधिकार तथा अनुसूचित जाति-जनजाति, हिंदू मुस्लिम अति पिछड़ा समुदाय और महिलाओं के विकास के लिए बड़े अतिरिक्त बजट की जरूरत है। जिससे कि समाज की मुख्य धारा से बहिष्कृत होते जा रहे इन समूहों को समावेशी विकास और लोकतंत्र का आधार बनाया जाए।
        यह निर्विवाद है कि हमारे देश में संसाधनों की कमी नहीं है और यहां के लोग ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उत्पादन में भी किसी देश और समाज से पीछे नहीं है। देश की आर्थिक संप्रभुता की रक्षा के लिए यह जरूरी हो गया है कि देश में पूंजी का आवागमन का नियन्त्रण व नियमन हो जिससे काले धन पर भी रोक लगे। जन कल्याण और पिछड़े हुए सामाजिक समूहों के विकास के लिए और देश में समृद्धि एवं शांति के लिए जरूरी है कि बड़े पूंजी घरानों की संपत्ति पर पर्याप्त टैक्स लगाया जाए। यहां यह भी नोट किया जाना चाहिए कि आम आदमी खासकर वेतनभोगी लोग जितना आयकर देते हैं उससे भी कम कारपोरेट टैक्स कारपोरेट घरानें देते हैं। इसलिए कारपोरेट टैक्स को भी बढ़ाया जाना चाहिए।      
         रोजगार सामाजिक अधिकार अभियान ने यह तय किया है कि हमारी मांग और आंदोलन का ‘केंद्रीय नारा कारपोरेट पर टैक्स लगाओ - रोजगार की गारंटी करो!’ है। इसके तहत झारखंड के लिए 9 सूत्री एजेंडा शामिल है, जिस पर हमारी राज्य इकाई पहले से ही अभियान चला रही है। उम्मीद करता हूं, कि यह कार्यशाला उनके इस अभियान को बल देगा और यह अभियान झारखंड में एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरेगा।

झारखंड में जारी अभियान का 9 सूत्रीय एजेण्डा

1- रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य, पेंशन और भूमिहीनों को आवासीय भूमि का अधिकार।
2- जनगणना में आदिवासी धर्म कोड और अन्य पिछड़े वर्ग का जाति कालम जोड़ा जाए! वनाधिकार कानून को लागू किया जाए।
3- झारखंड में डोमीसाईल नीति लागू की जाए और खतियान आधारित स्थानीय व नियोजन नीति बने।
4- जस्टिस रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट सार्वजनिक हो और अति पिछड़ों का अलग आरक्षण कोटा!
5- झारखंड के जमा-ऋण अनुपात में भारी अंतर है और यहां के लोगों की बैंकों में जमा पूंजी के बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन पर रोक!
6- चिट फंड कम्पनियों और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों द्वारा की जा रही आर्थिक लूट पर रोक!
7- स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं, नौजवानों एवं उद्यमियों को उद्यम लगाने हेतु सस्ते दर पर ऋण!
8- कारपोरेट व अरबपतियों की सम्पत्ति पर टैक्स लगे और जन कल्याण के लिए खर्च बढ़ाया जाए!
9- प्राकृतिक संसाधनों की लूट व निजीकरण बंद हो-पर्यावरण की रक्षा!
दिनांक - 30 जून 2026
अखिलेंद्र प्रताप सिंह
संस्थापक सदस्य, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट।
(29-30 जून 2026, रांची में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में प्रस्तुत पर्चा)