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30 जून 2026 को रांची, झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का पेपर

30 जून 2026 को रांची, झारखंड में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का पेपर 

दो दिन पहले एक साथी ने लिखा कि आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का कोई भविष्य नहीं है। उनका मंतव्य किसी बुरी भावना से नहीं बल्कि एक प्रचलित अवधारणा पर आधारित है कि आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट जैसे मोर्चा की अपेक्षा वाम दलों का संयुक्त मोर्चा अधिक जरूरी, प्रासंगिक और प्रभावी होगा। अमूमन लोगों की यह समझदारी है कि सिद्धांत पर आधारित पार्टी ही मोर्चे का निर्माण कर सकती है। चाहे वह उदारवाद पर या मार्क्सवाद पर आधारित हो अथवा डॉक्टर अंबेडकर या गांधी के विचार पर आधारित हो। पहले पार्टी फिर मोर्चा बनाना होगा। दल ही मोर्चे की प्राथमिक इकाई होंगे तभी मोर्चा सफल हो सकेगा। 

दरअसल यह विचार भारत को आजादी मिलने के बाद ही प्रभावशाली हुआ है। जब आचार्य नरेंद्र देव की अगुवाई वाली पार्टी को कांग्रेस से बाहर आना पड़ा। वैसे स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस किसी एक विचार, एक सिद्धांत पर आधारित नहीं थी। उसमें एक दौर में उदारपंथी, समाजवादी, रेडिकल्स यहां तक कि अनुदारपंथी तक की धारा मौजूद थी। अवाडी में 1955 में आयोजित अधिवेशन में कांग्रेस को एक सिद्धांत आधारित ढांचे के रूप में खड़ा करने का प्रस्ताव लिया गया। 

अपने जन्म काल 2012 से ही आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के गठन के पीछे जो अवधारणा काम कर रही है कि समाज और राजनीतिक ढांचा एक बड़े संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और उत्पादन प्रणाली में भी बड़े बदलाव होते दिख रहे हैं। अतः पुरानी सोच और औद्योगिक समाज के अंतर्विरोधों की समझ पर आधारित राजनीतिक पार्टियां उपयुक्त नहीं साबित होंगी। वित्तीय पूंजी के बढ़ते वर्चस्व को नए सिरे से समझना होगा और इसी के अनुरूप राजनीतिक संगठन का निर्माण करना होगा। जोकि 20 वीं सदी की विचारधाराओं से बहुत कुछ सीखेगा और आधुनिक दौर के अंतर्विरोधों के समाधान के लिए राजनीतिक संगठन खड़ा करेगा। इसी को आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने बहु वर्गीय-बहु जातीय जन राजनीतिक पार्टी का नाम दिया और एक रेखीय अवधारणा कि पहले एक सुगठित पार्टी फिर कई दलों का कार्यक्रम आधारित मोर्चा को पर्याप्त नहीं माना।

भारत के संदर्भ में देखा जाए वैसे तो कई मोर्चे मुख्य धारा के दलों ने बनाए हैं। लेकिन बराबर के अधिकार पर यह मोर्चे अभी तक निर्मित नहीं हो पाए हैं। पूर्व में यूपीए और अभी उसका नया अवतार इंडिया ब्लॉक इसके जीवंत उदाहरण है। अभी भी इंडिया ब्लॉक में जहां कांग्रेस का वर्चस्व है, वहीं एनडीए में भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व है।

आधुनिक युग में वैश्विक वित्तीय पूंजी और कॉर्पोरेट एकाधिकार ने आर्थिक शक्ति का अभूतपूर्व केंद्रीकरण किया है। दूसरी ओर सामाजिक असमानता, जाति आधारित भेदभाव, राजनीतिक-आर्थिक संप्रभुता का क्षरण, लोकतांत्रिक संस्थाओं का कमजोर होना, संघवाद पर दबाव, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, अधिनायकवाद का वर्चस्व, लैंगिक असमानता, डिजिटल एकाधिकार, पर्यावरणीय संकट और श्रमिक अधिकारों का खत्म होना जैसी अनेक चुनौतियां उपस्थिति हुई हैं। पूंजी का अत्यधिक केंद्रीकरण और लोकतंत्र आज के दौर का प्रधान अंतर्विरोध बनकर उभरा है। 

इन सभी प्रश्नों का समाधान किसी एक ऐतिहासिक चिंतन परंपरा से नहीं किया जा सकता। इसलिए आज का प्रश्न किसी एक विचारक को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि वर्तमान समय की लोकतांत्रिक चुनौतियों की पहचान कर ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम बनाया जाए जो इन सभी चुनौतियों का समग्र रूप से सामना कर सके। 

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इसी समझ से आगे बढ़ रहा है। यह केवल विभिन्न विचारधारा के लोगों का अस्थाई संयुक्त मोर्चा नहीं है और ना ही ऐसा दल जो किसी एक ऐतिहासिक विचारधारा को स्वीकार करना अपनी सदस्यता की शर्त बनाता हो। यह एक रेडिकल लोकतांत्रिक राजनीतिक संगठन है। जिसकी एकता उसके साझा लोकतांत्रिक कार्यक्रम पर आधारित है। यह मौजूदा राजनीतिक लोकतंत्र की रक्षा के साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक लोकतंत्र का पक्षधर है। मार्क्स, गांधी, डॉक्टर अंबेडकर, पेरियार, लोहिया भगत सिंह तथा अन्य लोकतांत्रिक परंपराएं इस दल के लिए प्रेरणा और बौद्धिक संसाधन हैं। किंतु यह कोई भी एक विचारक की अंतिम वैचारिक प्रमाणिकता का स्रोत नहीं है।

इस दल की पहचान किसी एक ऐतिहासिक सिद्धांत से नहीं बल्कि उसके लोकतांत्रिक कार्यक्रम व भारत की चुनौतियों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से निर्धारित होती है। यह कहना गलत होगा कि यह कई विचारधाराओं का मिश्रण (Eclecticism)  है। बल्कि यह वर्तमान ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप एक नई रेडिकल लोकतांत्रिक धारा को खड़ा करने का प्रयास है। 

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के संविधान में कहा गया है कि इसकी राजनीतिक अवधारणा की जड़ें जन लोकतंत्र, आजीविका और समावेशी राष्ट्रवाद में है। मार्क्सवादी परंपरा में जनवादी क्रांति या जनवाद की चर्चा होती है। तब लोगों का यह सवाल बनता है कि जब आप भी जन लोकतंत्र की बात करते हैं तो समाजवाद की बात आप क्यों नहीं करते? हमने जन लोकतंत्र का प्रयोग एक व्यापक राजनीतिक अवधारणा और कार्यक्रम के रूप में किया है ना कि दो चरण की क्रांति के संदर्भ में। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट यह मानकर नहीं चलता कि इतिहास का केवल एक पूर्ण निश्चित अंतिम लक्ष्य है। चाहे वह समाजवाद ही क्यों ना हो? इतिहास का निर्माण जनता के लोकतांत्रिक संघर्षों, सामाजिक अनुभवों, वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास, परिस्थितिजन्य चुनौतियों तथा समाज की सामूहिक लोकतांत्रिक चेतना से होता है।

यदि भविष्य में भारतीय समाज लोकतांत्रिक ढंग से यह निष्कर्ष निकाले कि न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए सार्वजनिक स्वामित्व, सहकारी स्वामित्व, लोकतांत्रिक समाजवाद या समाजवाद की आवश्यकता है, वह मार्ग खुला रहना चाहिए। यह समाजवाद का विरोध नहीं है बल्कि इसका अर्थ है कि समाजवाद लोकतांत्रिक भविष्य की एक संभावित दिशा है। लेकिन उसे पहले से ही एकमात्र वैध भविष्य घोषित नहीं किया जा सकता।