ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की 27 मई 2026 को हुई राष्ट्रीय कार्य समिति की वर्चुअल बैठक के नोट्स
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की 27 मई 2026 को हुई राष्ट्रीय कार्य समिति की वर्चुअल बैठक के नोट्स*
कार्य समिति ने यह नोट किया कि 1 अप्रैल 2026 से जो जनगणना देश में शुरू हुई है, इसमें अनुसूचित जनजाति की तरफ से आदिवासी धर्म कोड को शामिल करने की मांग जा रही है। इसको कमजोर करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े आदिवासी सुरक्षा मंच के द्वारा 24 मई 2026 को दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' में संविधान की धारा 342 को संशोधन कर धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों को जनजाति की सूची से बाहर करने की मांग को उठाया गया है।
दरअसल तात्कालिक तौर पर आदिवासी धर्म कोड के मुद्दे को भटकाने और रणनीतिक तौर पर आदिवासियों के हिंदुकरण के लिए भाजपा ने धर्मांतरण का यह मुद्दा उठाया है। भारतीय जनता पार्टी का मजबूत तर्क है कि राष्ट्रपति आदेश 10 अगस्त 1950 में जो यह व्यवस्था की गई थी कि जो अनुसूचित जाति के लोग हिंदू नहीं है उन्हें आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इसी को आधार बनाकर आरएसएस, भाजपा और उनकी सरकार की मंशा है कि जो आदिवासी धर्म परिवर्तन करके इसाई, मुसलमान या अन्य धर्म के अनुयाई हो गए हैं उन्हें अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के अधिकार से वंचित कर दिया जाए।
गौर करने लायक बात है कि एक खास परिस्थिति में संविधान के अनुच्छेद 341 के अधिकार के तहत राष्ट्रपति ने 1950 में यह आदेश दिया था। हालांकि अनुच्छेद 341 में हिंदू धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था नहीं है।1956 में सिख दलित को और 1990 में बौद्ध दलित को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया। इससे यह साफ है कि गैर हिन्दुओं को भी अनुसूचित जाति में लाने से धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था खत्म हो गई और आरक्षण धर्म से हटकर पुन: अस्पृश्यता, सामाजिक भेदभाव व शैक्षणिक पिछड़ापन पर आ गया।
इसलिए यह तर्क कि राष्ट्रपति के आदेश से 341 में संशोधन करके हिंदू धर्म के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था है और इस आधार पर अनुच्छेद 342 में संशोधन करके इसाइयों और मुसलमान को अलग करने की आरएसएस-भाजपा की बात पूरे तौर पर गलत है। यह भी महत्वपूर्ण है कि आदिवासियों को अस्पृश्यता के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी। उनका आधार सामाजिक भौगोलिक अलगाव, आदिम/पारंपरिक जीवन शैली, विशिष्ट संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन था। इसलिए भी 1950 के राष्ट्रपति आदेश को आधार बनाकर अनुच्छेद 342 पर बहस चलाना पूरी तौर पर गैर संवैधानिक है।
भाजपा की चालाकी देखिए जो फार्मूला आदिवासियों से अलग करने के लिए ईसाई और मुसलमान के लिए दिया जा रहा है। वहीं फार्मूला हिंदू धर्म को मानने वाले आदिवासियों पर भाजपा लागू नहीं कर रही है। उसका यह कहना कि 'सनातन और सरना एक है' यह भारत में धार्मिक विकास के इतिहास को नकारना है। दरअसल आरएसएस के लोग हिंदू धर्म के अलावा अन्य जितने भी धर्म हैं उन्हें एक पंथ या पूजा पद्धति के नाम पर खारिज करते हैं। जबकि भारतीय परम्परा और जनमानस में यह बात है कि सभी धर्म सत्य प्राप्त करने के अलग-अलग रास्ते हैं इसलिए उनके बीच में एक दूसरे का आदर व मैत्री भाव बना रहना चाहिए। इसीलिए 1961 तक आदिवासियों के लिए भी अलग धर्म कोड का प्रावधान था।
अनुसूचित जनजाति की सूची से अगर ईसाई और मुस्लिम के आदिवासियों को हटा दिया जाए। तो अनुसूचित जनजाति की संख्या भी देश में बहुत कम हो जाएगी और जो लाभ अभी आदिवासियों को मिल रहा है उसमें कटौती होगी। साथ ही पेसा, वनाधिकार कानून, संविधान की पांचवी व छठी अनुसूची में जो उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त है वह भी कमजोर हो जाएंगे।
सच कहा जाए तो आरएसएस-भारतीय जनता पार्टी आदिवासियों को नागरिक मानती ही नहीं है और आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों को अडानी-अम्बानी जैसे कॉर्पोरेट के हवाले करने में लगी हुई है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बर्बर दमन का एक कारण यह भी रहा है।
यह भी विवाद पैदा किया जा रहा है कि आदिवासियों में विभिन्न समूह और जातियां है जो सरना धर्म की जगह अपने-अपने धर्म को जनजाति धर्म कोड कालम में लिखवाना चाहती हैं, आखिर यह कैसे संभव है। यह भी आज के दौर में सच नहीं है। क्योंकि अधिकांश आदिवासी संगठनों में यह सहमति बन गई है कि सभी आदिवासियों का एक ही जनजाति कोड का कलाम बनाया जाए। आदिवासियों की इस जायज मांग को मानने की जगह सरकार एक आदिवासी समूह को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने में लगी हुई है। मणिपुर इसका एक उदाहरण है जहां खुद भाजपा की प्रदेश सरकार ने मैतेई और कुकीज के बीच में हिंसक वारदात के लिए एक समूह को उकसाया। भाजपा की इस नीति ने देश की आंतरिक शांति को खतरे में डाल दिया है और हजारों सालों से बनी हुई जनता की एकता और मैत्री भाव को नुकसान पहुंचाया है।
*ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट उन संगठनों के साथ अपनी एकता व्यक्त करता है जो जनगणना में अनुसूचित जनजाति के धर्म कोड की मांग करते हुए सड़कों पर हैं। आने वाली 29 जून 2026 को रांची में आदिवासियों के संवेदनशील और आदिवासियों व जनता के प्रतिबद्ध व्यक्तियों व समूहों के प्रतिनिधियों की बैठक होगी। साथ ही रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान आदिवासियों के इन मुद्दों को लगातार उठा रहा है।*
राष्ट्रीय कार्य समिति की तरफ से!
एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष